गुरुवार, 2 जून 2011

गृहस्थ की जगह अब तुम बैराग्य लो

मैं एक दिन आॅफिस से कुछ पहले घर आया
घोड़ा बेंचकर बिस्तर पर नींद फरमाया

फिर मन हीं मन आई लव यू कविता कह बुदबुदाया
यह सुनकर पत्नी को गुस्सा आया
उसका अंग तमतमाया
डर के मारे बिस्तर पर सूसू हो आया
फिर उसने हाथों में झाड़ू उठाया
मैं भूत-भूत कह चिल्लाया
भागकर दरवाजे पर आया
उसने मुझे जोर से दौड़ाया
मैंने कहा कि सबिता मुझे मांफ कर दो।
मेरे साफ इंसाफ कर दो
सविता लगता है मुझपर
किसी प्रेतात्मा की साया है
उसकी भी तुम्हारी तरह विषाल काया है।
उसने हीं मुझसे सविता की जगह कविता कहलवाया
तेरे संग बैर बढ़वाया
उसने कहा कि चिंता न कर मैं तेरा संदेह दूर कर दूंगा
जब जी भरके तुझे मैं पींट दूंगा
तेरे सर से भूत उतर जाएगा
मेरे मन का गुब्बार भी निकल जाएगा।
मैंने अंतिम तीर चलाया
गीता का उपदेष पिलाया
सविता तुम एक बीर पुरूष की वीर पत्नी हो
तुमने कितनी बार है मेरा साहस बढ़ाया
हनुमान चालिसा का है पाठ सुनाया
वैसे सोंचो तो कविता और सविता में क्या अंतर है
क और स ने तुम्हें है भरमाया
अब द्वैत को तुम कर दो
सविता के हाथों तुम मुझे सुपुर्द कर दो
जगत माया है अब तुम जान लो
गृहस्थ की जगह अब तुम बैराग्य लो

1 टिप्पणी:

  1. जगत माया है अब तुम जान लो

    मेरे मन का गुब्बार भी निकल जाएगा।
    मैंने अंतिम तीर चलाया
    गीता का उपदेष पिलाया

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