मंगलवार, 24 मई 2011

दूल्हा बाजार

दूल्हा बाजार
मान्यवर मुझे दूल्हे बाजार से
एक दामाद चाहिए
जो अक्ल का अंधा हो
झकमारना जिसका धंधा हो
दांत निपोरनेवाला बंदा हो
जाति पर कोई जोर नहीं
गंजेड़ी- भंगेड़ी से बैर नहीं
पर थोड़ा दिलवाला हो
दुम हिलाने वाला हो
उसे किसी बात का गुरेज न हो
खाना पकाने से परहेज न हो
उसे किसी बात का गुमान न हो
थोड़ा सा स्वाभिमान न हो
अब लड़की के बारे में बताते हैं
हम अपनी बात पर आते हैं
लड़की की राषि कुंभ है
उसे अपने आप पर दंभ है
वह घर में बैठकर पति को खिलाएगी
यानी एक जाहिल को जिलाएगी
जिसको जीवन में आराम चाहिए
बिना कुछ किए पकवान चाहिए
उसको तो यह धाम चाहिए
लड़की काम करने में अक्षम है
पर मुंह चलाने में सक्षम है
वह बात-बात में पति को झिड़केगी
सिर्फ जान नहीं और सब पति पर छिड़केगी
लड़की चलने में थोड़ी झुकती है
बोलने में रूकती है
उसे पुरूष जाति पर ऐतवार नहीं
उसके सर पर बाल नहीं
वह काफी मोटी-तगड़ी है
पर एक पैर से लंगड़ी है
उसे एक छत्र राज चाहिए
महल नहीं ताज चाहिए
सासू मां को वनवास चाहिए

1 टिप्पणी:

  1. हा हा हा हा .......क्या बात है ....काका हाथरसी की याद दिला दी आपने.....बहुत बढ़िया....अनेक शुभ कामनाये

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