मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

जलवायु परिवर्तन ऐसे रोकें।

 जलवायु परिवर्तन को रोकना असंभव नहीं, अगर विकाषील राष्ट्र  विकसित देषों के सुझावों पर अमल करंे तो। विकसित देषों के सुझावों पर अमल कर जलवायु परिवर्तन को आसानी से रोका जा सकता है। विकसित देषों का कहना है कि विकासील देष अगर हानिकारक गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगा देंगे, तो विकसित देष चाहे कितना भी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कर लें उससे क्लाइमेट चेन्ज नहीं होगा। इसको इस तरह से समझा जा सकता है। जिस प्रकार परमाणु क्लब में षामील राष्ट्रों को छोड़कर अन्य देषों के परमाणु हथियार बनाने से हथियारों की होड़ षुरू हो जाएगी। लेकिन परमाण राष्ट्रों के अपने परमाणु हथियारों के खत्म किए बिना हीं विष्व से परमाणु हथियारों का खात्मा माना जाएगा। जैसे कि अमेरिका के नेतृत्व में नाटों देष चाहे दूसरे देषों पर कितना भी बम बरसा लें उस  देष की संप्रुभता पर कोई खतरा उत्पन्न नहीं होगा। लेकिन अगर भारत पाकिस्तान को आतंकवादी गतिविधियों से बाज आने की चेतावनी भी दे दे तो साउथ एषिया का षक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा।  षांति व्यवस्था खतरे में पड़ जायेगी। हथियारों की होड़ षुरू हो जाएगी। अमेरिकी विदेष मंत्री का दौरा षुरू हो जाएगा। भारत को संयम रखने का उपदेष पिलाया जाएगा। इसको इस तरह से भी कहा जा सकता है कि परमाणु हथियारों से सम्पन्न राष्ट्र चाहे जितना परमाणु हथियार बनाना लें, विष्व के सुरक्षा व्यवस्था को कोई खतरा नहीं उत्पन्न होगा। और कोई देष बनाने की कोषिष करे तोे खतरा हीं खतरा नजर आएगा। जिस प्रकार विकाषील राष्ट्ों द्वारा अपने  किसानों को दी जाने वाली सब्सीडी कम या बंद कर देने से विष्व से मंदी दूर हो जायेगी। विष्व व्यापार संतुलित हो जाएगा। जिस प्रकार ओसामा के मारे जाने से विष्व से आतंकवाद खत्म हो जाएगा। जिस प्रकार आरक्षण लागू कर देने से समाज के एक वर्ग की किस्मत चमक जाएगी। दहेज कानून बन जाने से बहुओं की होली नहीं जलायी जाएगी आदि।
इसी को बात को विकसित राष्ट्रों ने एक मार्मिक अपील द्वारा विकाषील देषों को अपनी बात समझानी चाही है।
प्रस्तुत है उस अपील का सारांष-

विकसित राष्ट्रों की मार्मिक अपील - प्रिय विकाषील राष्ट्रों आप विकसित देषों की मांगों  पर उदारतपूर्वक विचार करें । चीन के कहा में मत आओ जी ,इतना निष्ठूर भी मत बनो जी। आखिर मानवता भी तो कुछ चीज होती है।  हमारी तुलना अपने आपसे क्यों करेते हो जी। हमें दुखों में रहने का कहां अनुभव है, लेकिन आपके साथ तो ऐसी बात नहीं है जी। हमें तो उपभोग का नषा है। लेकिन क्या आप के साथ भी ऐसा है। लोग कहते हैं कि पष्चिम उपभोग से उब चुका है। अब अध्यात्म की ओर लौट रहा है। लोगों की बातों में मत आओ जी। लोगों का तो काम है कहना। पुरानी आदत जल्दी कहां छुटती है। हमलोग एकदम मजबूर हैं जी।  लेकिन आप की धरती से तो संयम उपदेष गुंजा है। भारत जैसे देष में तोे पेड़-पौधों एवं नदियों तक को देवता कहा गया है। पर्यावरण का नुकसान पहंुचाकर अपने देवता का अपमान करोगे। आप पर्यावरण को नुकसान पहंुचाकर अपने देष का नाक मत कटवाइए। अपनी तुलना हमसे मत करो जी हम एडिक्ट हैं एडिक्षन इतनी जल्दी कहां छुटती है। आप षराब पीने वाले को कह दीजिए कि आज से वे षराब पीना छोड़ दें तो मुष्किल हो जाएगी जी। लेकिन आपने तो अभी षुरूआत की है जी, आप तो छोड़ सकते हो जी। इसलीए जलवायु परिवर्तन रोकने का जिम्मा ले लो जी। हमसे मत अपेक्षा रखो जी।

1 टिप्पणी:

  1. खूबसूरत प्रस्तुति ||
    बहुत बहुत बधाई ||

    terahsatrah.blogspot.com

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