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शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

चुनाव के वक्त गाए जाने वाले प्रमुख राग


चुनाव के माध्यम से जनता केवल अपनी मनपसंद सरकार का चुनाव हीं नहीं करती है, बल्कि अपना रचनात्मक विकास भी करती है। इस दौरान नेताओं का भी रचनात्मक विकास होता है।  माननीय सदस्यगण चुनाव के वक्त कुछ अलग करने को सोचते हैं, और लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनी सारी उर्जा लगा देते हैं। यह समय भारतीय संगीत के विकास का भी स्वर्णीमकाल माना जाता है, क्योंकि इस दौरान भारतीय संगीत का खूब विकास होता है। यह वह काल है जिस दौरान विविध रागों का जन्म होता है। भारतीय संगीत को समृद्व करने में चुनाव का योगदान सराहनीय है। नेतागण इस समय विविध रागों का गायन करते हैं। इस प्रकार वे जनता को अपने मधुर गायन द्वारा स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करते हैं। देष में संगीत एवं कला को पर्याप्त महत्व दिया जाता है। षास्त्रीय संगीत के रूप में देष में संगीत की बहुत बड़ी विरासत रही है। अनेको रागों का जन्म इस धरती पर हुआ है, जिसमें से अधिकांष रागों का जन्म मेरे अनुसार चुनावों के दौरान हीं हुआ होगा।
उत्तर प्रदेष चुनाव के दौरान भी विविध रागों की खोज एवं गायन हुआ। इस चुनाव में सर्वाधिक चर्चित राग बटलाहाउस इनकांउटर राग रहा। इस राग की खोज का श्रेय कांग्रेस के नेताओं को जाता है।  पार्टी के प्रमुख नेताओं ने इस राग का गायन उत्तर प्रदेष चुनाव के दौरान पूरे मनोयोग से किया। पार्टी नेताओं का मानना है कि इस राग के गायन से मुस्लिम वर्ग भाव विभोर हो जाता है, और जमकर पार्टी के पक्ष में मतदान करता है। पार्टी का मानना है कि हर राग का एक निष्चित प्रभाव होता है। रागों के प्रभाव से दीपक तक जल जाता है, फिर रागों के द्वारा जनता को मतिभ्रम करना और अपने पक्ष में मतदान कराना कोई मुष्किल काम नहीं है। पार्टी का मानना है कि बटलाहाउस इनकांउटर राग का प्रभाव मुस्लिम वर्ग पर खूब पड़ेगा। पार्टी का दावा कितना सही है इसका पता तो चुनाव परिणाम बाद चलेगा। लेकिन सभी पार्टियां अपने राग को श्रेष्ठ बता रही हैं अपने राग का प्रभाव जनता पर सर्वाधिक होने का दावा कर रही हैं।
बटलाहाउस इनकांउटर राग को लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिग्गिराजा एवं सलमान खुर्षीद जैसेे बड़े नेताओं को जाता है। इस राग के बारे में कहा जाता है कि यह एक गम प्रधान राग है। जो चुनाव के वक्त नेताओं का रागयुक्त कर देता है। इस राग को गानेवाला इतना भाव प्रधान हो जाता है कि वह अपने पराये का भेद भूल जाता है। दिग्गिराजा भी आजमगढ़ में इस राग को गाते वक्त इतना भाव विभोर हो गए थेे कि अपने हीं पार्टी के प्रधानमंत्री एवं एवं गृहमंत्री को  कटघरे में खड़ा कर दिए थे। वैसे अक्सर वे कोई कोई राग गाते रहते हैं और गाते -गाते भाव विभोर भी हो जाते हैं।
 इस राग के बारे में कहा जाता है कि इसको सूनने वाले के ऑखों से गंगा-जमुना की धारा बह निकलती है। सलमान खुर्षीद का दावा है कि इस राग ने पार्टी अध्यक्ष को रोने को विवष कर दिया था। हालंाकि इस राग के विरोधियों का कहना है कि इस राग का प्रभाव व्यापक नहीं होता है। इसका प्रभाव एक वर्ग विषेड्ढ पर आंषिक होता है। कुछ पर तो इस राग का साइड इफेक्ट भी देखा जा रहा है।  इस राग के विरोधियों का एक वर्ग का कहना है कि इस राग की सबसे बड़ी कमी यह है कि इसे चुनाव जैसे उत्सव के वक्त हीं गाया जा सकता है। साथ हीं यह राग एक वर्ग विषेड्ढ को प्रभावित करने की हीं क्षमता रखता है, सबको नहीं। यद्यपि दूसरे दल भी इससे मिलते-जुलते राग गाते हैं। बटलाहाउस राग का गायन समाजवादी पार्टी भी जानती है। लेकिन इस राग के गायन में इस चुनाव में वह पिछड़ चुकी है। भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियों नेे इससे मिलते-जुलते राग की खोज कर रखी हैै। और सभी अपने अपने राग का गायन जोर-षोर से चुनाव के वक्त करे रही हैं।
 भाजपा का राग कांग्रेस, बसपा एवं समाजवादी पार्टी से एकदम भिन्न है। राममंदिर निर्माण राग एवं बांग्लादेषी घुसपैठी राग पार्टी का प्रमुख राग है। इन रागों की खोज पार्टी द्वारा बहुत पहले कर ली गई थी। और हर चुनाव में पार्टी इसका हीं गायन करती है। विरोधियों का कहना है कि इस राम मंदिर निर्माण राग को सुनसुन कर जनता बोर हो चुकी है। इसलिए इस राग के गायन का प्रभाव जनता पर नहीं देखा जा रहा है। उनका यह भी कहना है कि जनता के प्रभावित नहीं होने का कारण यह है कि इस राग के गायन का फल अबतक नहीं मिला है। और दूसरी बात यह है कि बीजेपी अपने षासन काल में इसका राग का गायन भूल जाती है।
इस चुनाव में अन्ना एण्ड कंपनी भी एक राग गा रही है। वह घुम घुमकर लोकपाल नामक राग गा रही है। हालांकि इस राग का व्यापक प्रभाव लोगों में पहले देखा जा चुका है। देखना यह है कि यह राग चुनावों में वहीं प्रभाव छोड़ता है जो आंदोलनों के दौरान छोड़ा था।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

ओबामा से सीखो वोट मांगना

अपने यहां वोट मांगने के तरीके निराले हैं। यहां मागने में भी बाहुबल का प्रयोग होता है।  ऐसा नहीं कि नेता हीं केवल वोट बाहुबल से मांगते हैं बल्कि आमजनों को बाहुबल के द्वारा मांगते देखा गया है। यहां नेतागण गला फाड़ फाड़ कर वोट मांगते हैं। कींचड़ उछालने का काम खुलेआम करते हैं। जबकि अमेरिका में यह काम षालीनता एवं सभ्य ढंग से किया जाता है। यानी किंचड़ उछालो मगर प्यार से। मेरा मानना है कि भारतीय नेताओं को ओबामा से वोट मांगने की कला सीखनी चाहिए। हमारे नेता कह सकते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है हम क्यों जाएं किसी और से सीखने। क्या अमेरिका वाले हमसे बुथ कैपचरिंग करना सीखे थे। अगर अमेरिका में बुथ कैपचरिंग प्रचलित होता तो क्या चुनाव आयोग भारत में बूथ कैपचरिंग को असंभव  बना देता। मेरा मानना है कि सीखने में बुराई नहीं है। ज्ञान कहीं से भी सीखा जा सकता है। वैसे भी हमारे नेता जब घोटाला करने सीख जाते हैं। तो वोट मांगने की कला सीखने में बुराई क्या है। 
वैसे भी अपुन की सरकार अमेरिकी नीतियों पर अमल करती हीं रहती है या करने का आरोप इसपर लगता है। और बार-बार सरकार को सफाई देनी पड़ती है कि ऐसी बात नहीं माननीय सदस्यों को कनफयूजन हो गया है। हम तो चीन या पाकिस्तान को बैलेंस केवल बैलंसे कर रहे हैं जैसा कि पाकिस्तान के नेता चीन यात्रा कर भारत एवं अमेरिका को बैलेंस करते हैं। 
अब आइए हम आपको अमेरिका ले चलते हैं जहां हमारे संवाददाता बड़ी खबर के साथ मौजूद हैं । वे आपको बताएंगे कि ओबामा चुनाव जीतने के लिए वहां क्या-क्या कर रहे है। लीजिए सुनिए उन्हीं की जुबानी। ओबामा अमेरिकी लोगों को बता रहे हैं कि भ्रष्टाचार के टीके की खोज अमेरिका के लिए अति आवष्यक है। 
क्या अमेरिका नए साल में यह कारनाम कर पाएगा? क्या विष्व राजनीति में वह फिर धाक जमा पाएगा। क्या ओबामा अपने नागरिकों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए लोगों को मना पायेंगे। क्या विजय का परचम एक बार फिर ओबामा फहरा पायेंगे। इसका उत्तर भ्रष्टाचार के टीके की खोज में निहित है। अगर भ्रष्टाचार के टीके की खोज अमेरिका के लिए संभव हुआ तो नया साल अमेरिका होगा, नया साल ओबामा का होगा। नही तो बाजी कोई और मार ले जायेगा।
 भ्रष्टाचार के टीके की खोज ओबामा को अपनी उपलब्धि गिनाने के लिए आवष्यक है । हालांकि उनकी लोकप्रियता में पहले की अपेक्षा इजाफा हुआ है लेकिन ओबामा इसे जीत के लिए पर्याप्त नहीं मानते। अमेरिकी ओसामा के मारे जाने को उपलब्धि मानने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में ओबामा चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के टीके की खोज जल्द से जल्द हो जाए। उनको डर है कि अगर भ्रष्टाचार के टीके की खोज  प्रतिद्वन्दी राष्ट् चीन ने कर दी तो उनकी लोकप्रियता  पाताल लोक को छू सकती है।
उनका यह भी मानना है कि भ्रष्टाचार का टीका अमेरिकी नागरिकों में यह एहसास जगाएगा कि विष्व राजनीति में उनका अभी वर्चस्व समाप्त नहीं हुआ है। और चीन के सम्राज्य विस्तार की बात हवा हवाई से ज्यादा कुछ नहीं है।
ओबामा ने अपनी योजना को अमलीजामा पहराने के लिए टीम भी गठित कर दी है। टीम ने 24 घंटे में 24 मीटींग करके भ्रष्टाचार के टीके के खोज को इमरजेन्सी घोड्ढित कर दिया है। साथ हीं एक स्वर से अमेरिकी नागरिकों को भारत यात्रा न करने की सलाह दी है।  क्योंकि यहां अन्ना भ्रष्टाचार के टीके की खोज में जोर-षोर से लगे हैं। ऐसे में अगर विरोधी पार्टी का कोई सदस्य भ्रष्टाचार के टीके की टेक्नोलॉजी सीख लेगा तोे क्रेडिट वह ले जाएगा ।
यह भी कहा जा रहा है कि ओबामा को डर है कि उसके नागरिक भारत यात्रा के दौरान भ्रष्टाचार के वाइरस संक्रमित हो सकते हैं। ओबामा यह भी चाहते हैं कि अमेरिकी नागरिक जहां तख्ता पलट हो चुका है या होने की संभावना है वहां सावधानी से यात्रा करें।
कहा जा रहा है कि अमेरिका को डर है कि अगर पाकिस्तानी नागरिकों की तरह अमेरिकी प्रदर्षनकारीे भी कभी अन्ना हजारे को अमेरिका आकर भ्रष्टाचार के विरूद्ध आन्दोलन कीे अगुवायी करने का निमंत्रण दे दिया तो वह फिर किस मुंह से अन्ना रोकेगा। पाकिस्तान तो रॉ का एजेंट बताकर अन्ना को रोक सकता है लेकिन अमेरिका क्या कहकर रोकेगा।





शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

2011 की सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज



2011 की  सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज क्या थी। इस प्रष्न पर भिन्न-भिन्न लोगों की भिन्न- भिन्न राय हो सकती है। अमेरिका के लिए ओसामा का मारा जाना ब्रेकिंग न्यूज हो सकता है। तो भारत के लिए अन्ना का भ्रष्टाचार के विरूद्ध बड़ा आन्दोलन खड़ा करना। पाकिस्तान के लिए जरदारी का तख्तापलट रोकने के लिए अमेरिकी गुहार। लेकिन मेरे लिए बीते साल की सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज रही मनमोहन सिंह का गिलानी को षांति पुरूड्ढ की संज्ञा देना।


मनमोहन सिंह के इस धमाका के आगेे दिग्गिराजा के सारे धमाके फीके पड़ गये । मनमोहन सिह ने गिलानी के षांति पुरूड्ढ का अवॉर्ड देकर उनके सारे गिलवे सिकवे दूर कर दिए। वहीं गिलानी कृतज्ञता में यह कहने पर मजबूर हो गए कि जल्दी हीं वह इसका णिं सीमा पार से भारी गोलीबारी करवा कर चुकता कर देगें।
मनमोहन सिंह ने लोगों के इस सवाल का धमाकेदार जवाब दिया कि वे कोमल हैं पर कमजोर नहीं । आवष्यकता पड़ने पर वे भी वाजपेयी की तरह इतिहास रच सकते हैं। क्योंकि इतिहास रचने का अधिकार केवल व्यक्ति विषेड्ढ या पाटी विषेड्ढ को नहीं है। मनमोहन ने गिलानी को षांतिपुरूष कहकर विरोधियों को यह भी बता दिया कि वे वाजपेयी एवं इंदिरा गांधी से कहीं अधिक परिपक्व राजनेता हैं। क्योंकि उनकी तरह वे मदहोसी का इंजेक्षन नहीं लगाना जानत थेे।
हालांकि सूत्रों के अनुसार मनमोहन सिंह का दर्द भी उनके इस कथन में झलका। जो कम बोलता है वह जब बोलता है तो धमाका करता है।  विषेड्ढज्ञों की नजर में उनका यह कथन दबाव से निकलने की एक तरकीब हो सकती है। वे विरोधियों के दबाव से इतना दब गए थे कि उन्हें यह बताना जरूरी हो गया था कि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में ख्वाब देखने की स्वतंत्रता है। वे केवल रबर स्टंप प्रधानमंत्री नहीं है। उन्होंने आकाषवाणी करके लोगों को यह याद दिलाया कि कभी-कभी हीं सही सोनियां गांधी स्वयं विदेषी दौरे के दौरान उन्हें विदायी दे चुकी हैं। अतः सोनियां के दबाव की बात कहना हवाहवाई से ज्यादा कुछ नहीं है। वे कार्य करने में पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
हालांकि विरोधी पार्टियों का कहना है कि गठबंधन दल के नेता अपने कार्यव्यवहार द्वारा प्रधानमंत्री पद का अवमूल्यन कर रहे थे और उनके पार्टी के नेता भी उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं दे रहे थे। इसका परिणाम यह हुआ कि उनका गुस्सा गिलानी को षांतिपुरूड्ढ कहकर फुट पड़ा। अधिक दबाव का नतीजा था कि प्रधानमंत्री को ऑपरेषन भड़ास विदेषी धरती पर करना पड़ा। क्योंकि वहां न तो ममता थी और न  मैडम हीं।
कुछ लोग के अनुसार प्रधानमंत्री अपने दुख को कभी-कभी इन षब्दों में भी व्यक्त करते हैं। क्या मुझे इतिहास रचने का अधिकार नहीं है। मुझे लोकपाल पर क्यों नहीं आगे बढ़ने दिया जा रहा था यह बात तो समझ में आती है। लेकिन पाकिस्तान से संबंध बढ़ाने पर देष में हाय तौबा मचाना  मेरे समझ से परे है। भला मै कोई गोलीबारी थोड़ी कर रहा था जो पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ जाता। पाकिस्तानी नेताओं को गाली देने से क्या समस्या का हल निकल पाएगा। बाप रे बाप कुछ नहीं कहने पर तो वे इतनी गोलीबारी करवाते हैं। कुछ कह देने पर तो वे परमाणु बम हीं फेंक देंगे। मनमोहन सिंह का यह भी कहना है कि यह तो सामान्य समझ का व्यक्ति भी समझ सकता है। जो काम प्रेम से करवाया जा सकता है वह लड़-झगड़कर तो कतई नहीं करवाया जा सकता है। मैंने कोई नया काम थोड़े किया। वैसे भी इस देष में  षांति जाप की षाष्वत परंपरा रही है। अबतक का सुपरहिट षांति मंत्र रहा है हिन्द-चीन भाई-भाई। जो अबतक बहुत हीं फलदायी रहा है। वे चाहते हैं कि इस देष में षांति जाप की परंपरा कायम रहे। क्योंकि आदिकाल से हमारा राष्ट परंपरा प्रधान रहा है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि विदेषी धरती मनमोहन अपने को स्वतंत्र महसूस करते हैं। बाहर उन्हें मैडम से भय वाली बात नहीं होती। इसलिए वे कभी- कभीे ऐसा बोल जाते हैं जो ऐतिहासिक की श्रेणी में आता है।
कुछ लोगों का कहना है कि मनमोहन सिंह एक सोची-समझी रणनीति के तहत यह कदम उठाए थे। मोस्ट फेवरेस्ट नेषन का दर्जा पाकिस्तान की ओर से नहीं मिलने के बाद वे एक सोची-समझी नीति के तहत यह वक्तव्य दिए। दरअसल प्रधानमंत्री की योजना गिलानी को मदहोसी का इंजेक्षन लगाने से था। क्योंकि वे जानते हैं कोई भी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री पुरे होषोहवाष में भारत के साथ षांति बहाली का प्रयास नहीं कर सकता क्योंकि उसको अंजाम का भय सतायेगा। मनमोहन चाहते हैं कि गिलानी को मदहोषी का इंजेक्षन लगाकर वो काम करा लें जो अबतक उनके पूर्ववर्ती नहीं करा पाए हैं।
जैसा मुख वैसी बातें। आप भी विषेड्ढज्ञ हैं आप अपनी राय हमें लफुआ एट द रेट डॉट काम पर भेज दें आपकी बात मिर्च मसाला लगाकर प्रकाषित की जाएगी।

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

लगे रहो मुन्नाभाई ।
वैसे तो कौन नहीं अपने आपको को ज्ञानी कहलाना चाहेगा।  लेकिन ज्ञानी बनना इतना आसान काम नहीं। वास्तविकता यह है कि अधिकांष लोगों को अधिकांष चीजों की सतही जानकारी होती है। उनके अंदर गहरे ज्ञान का अभाव रहता है। जनसंख्या वृद्धि को हीं ले लीजिए। जनसंख्या वृद्वि के फायदे को आखिर कितने लोग जानते है। सभी लोग आपसे यहीं कहते मिलेंगे कि, जनसंख्या वृद्वि रोके बिना गरीबी दूर नहीं हो सकती। अर्थव्यवस्था की सेहत  सुधर नहीं सकती। ऐसा कहने वाले लोगों में मौलिक सोच का अभाव होता है। वे लकीर के फकीर होते हैं। दुर्भाग्यवष जनसंख्या वृद्वि के संदर्भ में न व्यक्ति दूरदर्षिता का परिचय दे रहा है और न राष्ट्र। जबकि दूरदर्षिता के महत्व को हर कोई जानता है।
न जाने क्यों लोग जनसंख्या वृद्वि को रोकने को इतना आतुर दिखते है। अधिक बच्चे पैदा करने को पिछड़ी मानसिकता का परिचायक मानते हैंै। जबकी दूरदर्षी जानते हैं कि आने वाले दिनों में जनसंख्या वृद्वि के लिए लोगों को सरकार की ओर से प्रोत्साहन पैकेज दिया जाएगा। अधिक बच्चा पेदा करने वाले को सम्मानित किया जाएगा। अबतक जनसंख्या वृद्वि रोकने के लिए न जाने कितनी नीतियां बन चुकी है। अरबो-खरबो रूपया जनसंख्या रोकने के नाम पर फूंका जा चुका है। लेकिन नतीजा षुन्य रहा है। आखिर रहेगा क्यों नहीं  प्रकृति विरूद्ध काम का नतीजा तो यहीं  होगा न। लोग यह क्यों नहीं जानते कि विष्व में आने वाली आगामी मंदी जनसंख्या क्षेत्र में हीं होगी। क्योंकि विष्व का अधिकांष देष परिवार नियोजन का पालन कर रहंे हैं। ऐसे में चुपचाप जनसंख्या वृद्वि करने में हीं बुद्विमानी है। जब और देषों में जनसंख्या का अकाल हो जाएगा, तो दूसरे देषों में जाकर यहां के लोग ऐष कर सकते हैं। जिस तरह चांद पर बसने की संभावना है। ठीक उसी प्रकार आने वाले दिनों में भारत के लोगों की दूसरे देष में जाकर बसने की संभावना है। और वहां के सरकार इसके लिए तमाम तरह की रियात देगी। आपके मन में यह प्रष्न उठ रहा होगा कि क्या जनसंख्या वृद्धि को बढ़वा देकर हम अप्रगतिषील नहीं कहाएंगे। आखिर हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। इसपर मेरा कहना है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ेगा हीं न। जीरो रिस्क वाली बात तो किसी भी काम में नहीं होती। हां मैं आपको जरूर यह आष्वस्त कर सकता हूं कि आप घाटे में नहीं रहेंगे। एक दूसरा प्रष्न भी आपके मन में उठ सकता है। क्या दूसरे देषों को मूर्ख बनाना इतना आसान है। तो मेरा कहना है क्यों नहीं जब पाकिस्तान अमेरिका सहित पूरे विष्व को मूर्ख बना सकता है तो भारत क्यों नहीं बना सकता? जैसा कि वह  दिखावे के लिए आतंकवाद के विरूद्व लड़ाई लड़ सकता है और पूरा विष्व उसे मान सकता है। तो भारत क्यों नहीं चुपचाप जनसंख्या वृद्धि कर सकता है।
 दूसरी बात कि अपने देष के  बुद्विजीवियों के आक्रमण से बचने के लिए भी आपको उपाय सोचने होगें। बाहर से देष दिखाए कि वह जनसंख्या वृद्वि रोकने के लिए बहुत सीरियस है। आवष्यकता हो तो इसके लिए सौ-पचास जबर्दस्ती नसबंदी भी करा दे। लेकिन अंदर हीं अदंर लोगों को जनसंख्या बृद्वि के लिए खूब प्रोत्साहित करे। जनसंख्या वृद्वि के कुछ और फायदे है। जैसे
जनसंख्या वृद्धि व्यक्तित्व विकास के लिए जरूरी है। क्योंकि
व्यक्तित्व विकास के लिए समाज का होना जरूरी है। बालक का समाज से परिचय परिवार के रूप में होता है। बालक सामाजिक होना परिवार से सिखता है। अतः परिवार जितना बड़ा होगा व्यक्ति उतना हीं अधिक सामाजिक होगा।

जनसंख्या वृद्धि से व्यक्ति चुनौतियों का सामना करना सिखता है। कई पुत्र होने से परिवार में अगर खाने को नहीं होगी तो मारा -मारी होगी। ऐसा होना बच्चों के मानसिक विकास के लिए बहुत अच्छा होगा। क्योंकि उनके आगे के जीवन में कितना भी अभाव आ जाए वे समस्या का रोना नहीं रोएंगे। वे लड़ झगड़कर दूसरे का हक मारकर अपना हक प्राप्त हीं कर लेंगे।
सुरक्षा के भाव के लिए जनसंख्या वृद्धि जरूरी- अधिक बच्चे माता पिता में सुरक्षा का भाव पैदा करते है। जिसका एक बच्चा होगा उसको हमेषा चिंता रहेगी ,अगर वह उसके बुढ़ापे का सहारा नहीं बनेगा तो क्या होगा। वहीं जिसके कई पुत्र होगें वह यह सोच सकता है कि एक नहीं करेगा। दूसरा तो करेगा न। भले हीं कोई न करे।
बड़ा परिवार सुखी परिवार - अगर आप पड़ोसियों के बीच धाक जमाना चाहते उन्हें अपने सामने झुकाना चाहते हैं। तो क्रिकेट टीम खड़ा कर हीं दीजिए।  आपके बच्चों को देखकर हीं पड़ोसियों को नानी याद आ जाएगी। पड़ासियों को आपके परिवार की ओर आंखें उठाने की हिम्मत नहीं होगी। यानी हर जगह आपकी तुती बोलेगी। तो फिर देर किस बात की लगे रहो मुन्नाभाई ।

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

कौन अन्ना को कितना प्यार करता है?

बात पुरानी है लेकिन रोचक कहानी है। जीं हां मैं बात कर रहा हूं अपने दिग्गी राजा के बारे में जो अपने नित नये बयानों से विकिलिक्स को भी पछाड़े रहते हैं। आइए अब हम विड्ढय पर आते हैं।
दिग्गविजय सिंह जी केे कुछ दिन पूर्व दिए बयान से मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि ,वे अन्ना से दिलोजान से प्यार करते हैं। उनके इस कथन पर कोई विष्वास करे या ना करे, मैं षत प्रतिषत करता हूं। मेरा तो यहां तक कहना है कि वे अन्ना से सबसे अधिक प्यार करते हंै। अन्ना स्वयं कह चुके हैं कि दिग्गी राजा उनका पांव छूते थे। यानी सिंह साहब उनका पहले से सम्मान करते रहे हैं। उनका प्यार कोई नया नहीं है। इसके अलावे वे समय-समय पर उनको प्रेम पत्र भी लिखा करते हैं। दिनभर उनकी हीं बारे में बाते किया करते हैं।
अभी यह अस्पष्ट नहीं हो पाया है कि कांगे्रस ने उनको उत्तर प्रदेष का प्रभार दिया है कि अन्ना का प्रभार दिया है। कारण कि अक्सर प्रेस से उनकी हीं बाते किया करते हैं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि वे अन्ना को ज्यादा प्यार करते हैं कि रामदेवजी को ज्यादा, क्योंकि रामदेवजी के आंदोलन के दौरान  वे केवल रामदेव की बातें किया करते थे। 
 अन्ना से प्यार करने वाले में दूसरा नम्बर कपिलजी का आता है। जिनका प्यार अन्ना के प्रति षाष्वत है , पवित्र है ,क्योंकि वह अन्ना, रामदेव, एवं स्वामी अग्निवेष तीनों पर समान रूप से बरसता है।  सच्चा प्रेम भेद नहीं जानता। उसे सीमा में नहीं बांधा जा सकता। उसे दोस्त और दुष्मन की पहचान नहीं होती। अन्ना को प्यार करने वालों में तीसरा नम्बर मनीष तिवारी का आता है। जो उनके प्यार में इतना भाव-बिभोर हो जाते हैं कि उनको भ्रष्टाचार में आंकठ डूबे हुए बताकर स्तुती करते हैं। तब अति भावुक देखकर कांग्रेस याद दिलाती है कि टू मच हो गयाजी। बस करो अब हजम नहीं होगा। तब जाकर वे सार्वजनिक रूप से खेद जताते हैं और कहते हैं अन्ना एवं उनके समर्थक उन्हें बालक समझकर मांफ कर दें।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

लोकलाज छोड़ने वालों के पास अवसर हीं अवसर होता है

अवसर की कमी उसके लिए  है जिसकी प्रतिभा औसत दर्जे की है या उससे भी कम है। जिसके पास प्रतिभा का विस्फोट है उसको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। चाहे कितनी बड़ी मंदी क्यों न आ जाए। आप यह कह सकते कि यह कैसे जाना जाए कि किसके पास प्रतिभा का बिस्फोट है। तो मेरा कहना है घोटाले करने वाले और अपहरण करने वाले या कराने वालों के पास प्रतिभा का बिस्फोट होता है।
मंदी से अवसर की कमी हम क्यों मान लें। क्या मंदी के दौरान अपराध में गिरावट आ जाती है। क्या तस्करी रूक जाती है। क्या मानव अंगों का व्यापार नहीं होता है। क्या जाली नोटों का कारोबार रूक जाता है। क्या चोरी- चमारी, छीना -झपटी बैंक डकैति आदि में गिरावट आ जाती है। नहीं न, तो फिर कैसे मान लिया जाए कि मंदी से बेरोजगारी बढ़ जाती है। अर्थ व्यवस्था तबाह हो जाती है। क्या मंदी से अपहरण उद्योग में जान नहीं आ जाती है? हां यह जरूर कर्मचारियों की अदला-बदली जरूर हो जाती है। तस्करी, अपहरण और जाली नोटों के कारोबार वाले उद्योगों में लोगों का विष्वास जरूर बढ़ जाता है। जो लोग नैतिकता की बात करते हैं या ईमान की इजाजत नहीं देने की बात करते हैं। वे भूखों मरते है। ये परिवर्तन को जल्दी नहीं स्वीकार करने वाले लोग होते हैं। ये लोग मल्टीटास्क कतई नहीं होते हैं और बेरोजगार रह जाते हैं। और बेरोजगारी का खूब रोना भी रोते हैं।
 आज के दौर में जब आॅलराउण्डर नहीं बनेंगे तो रोजगार क्या खाक मिलेगा। जब हर जगह मल्टी टाॅस्क की मांग हो। छिनैती जब फायदे का धंधा न रह जाये तो अपहरण उद्योग में षिफ्ट हो गये, उसमें भी अवसर न दिखे तो जाली नोटों का कारोबार करने लगे।
परंपरागत उद्योगों में रोजगार ढ़ूढोगे तो काम कहां मिलने वाला है। कुछ हट करना होगा। इसके लिए आपको संकोच छोड़ना होगा। लोकलाज को तिलांजली देनी होगी। जो इस बात का छोड़ दिया कि, लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे उसको फिर अवसर हीं अवसर है। फिर वह भीख मांग कर भी अपने तथा अपने परिवार का भरण-पोड्ढण कर लेगा। फिर उसे दुनिया कि कोई ताकत आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
इसी प्रकार मानव अंगों की तस्करी करने वाले को भी कहां कानून का डंडा रोक पाता है। प्रतिष्ठित व्यक्तियों पर जूता चलाने वाले जांबाज भी आखिरकार तमाम बाधाओं एवं विरोध के बीच अपना स्थान हैं। उनकी राह कोई आसान नहीं होती। लोक निंदा जैसे बाधा उन्हें कहां रोक पाती है।
प्रेरक प्रसंग हर जगह मौजूद हैं। आवष्यकता है उसको पहचानने की। घोटाला करने को हीं ले लें। क्या सामान्य मनोदषा वाला व्यक्ति घोटाला कर सकता है। घोटाला को वहीं खराब कहता है, जिसके पास इसे करने की हिम्मत नहीं होती। इसी प्रकार
भ्रष्ट्राचार करने के लिए भी अदम्य साहस एवं दृढं इच्छा षक्ति की आवष्यकता होती है। इसलिए मैं भ्रष्ट्राचारियों को सर्वोच्च सम्मान देने की वकालत करता हूं। सामान्य मानसिक दषा वाले व्यक्ति को घोटाला करने की सोचने मात्र से नानी याद आ जाएगी। हार्ट अटैक हो जायेगा। सीबीआई एवं जेल जाने का भय सताएगा। इसके समर्थन में लफुआ एण्ड कंपनी ने मेरे नेतृत्व में एक रैली भी निकाली है। जिसको संबोधित करते हुए मैंने सरकार से इसे लीगलाइज करने की मांग उठायी है। लफुओं को संबोधित करते हुए मैंने कहा कि भ्रष्ट्राचार सरकार की अर्कमण्यता के चलते आज गैरकानूनी है। परिणामस्वरूप करोड़ो रूपये पानी की तरह जांच के नाम पर बहाना पड़ता है।
मेरे नेतृत्व में एक षिष्टमंडल अन्ना हजारे से भी मिलेगा और उनसे राष्ट्र को गुमराह नहीं करने की अपील करेगा।

पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने बाजी मार हीं ली।

बात कुछ दिन पहले की है जब कुछ पाकिस्तानी क्रिकेटरों को सट्टेबाजी के जुर्म में जेल की सजा सुनाई गयी।  इस फैसले से  पाकिस्तान ने पड़ोसी देष पर बढ़त हासिल कर ली।
वैसे तो पाकिस्तान एवं भारत में युद्ध अक्सर होता रहता है। युद्ध के मैदान न सही खेल का मैदान में हीं सही। दोनों ओर के खिलाड़ी जंग जितने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देते हैं। पिछले कुछ दिनों से पाक क्रिकेट संकट के दौर से गुजर रहा था। कारण कि कोई भी देष  वहां जाकर खेलने को तैयार नहीं था। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को कोई उपाय हीं नहीं सुझ रहा था कि इस विड्ढम परिस्थिति से कैसे निपटा जाए। लेकिन एक अप्रत्यासीत घटना ने  न केवल पाकिस्तानी क्रिकेट का गौरव वापस लौटाया ,बल्कि उसे पड़ोसी देष पर बढ़त भी दिला दी। क्रिकेट के इतिहास में पहली बार जेल जाकर पड़ोसी देष के खिलाडि़यों ने आखिरकार भारत को पछाड़ हीं दिया। बहुत दिनों से उसकी ख्वाहिष थी कि पड़ासी देष उससे मात खाए। लेकिन मौका नहीं मिल रहा था। आखिरकार पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने अपने देष के गौरव में चार चांद लगा हीं दिया। उन्हें डर था कि भारत एवं कोई अन्य देष ने अगर बाजी मार लिया तो, उनके देष में उन लोगों की काफी ऐसी-तैषी होगी। हो सकता है कयानी के अदालत में पेष होना पड़े। विष्व क्रिकेट के इतिहास में पहली बार पाकिस्तानी क्रिकेटर जेल का सफर तय करेंगे। इसके पहले पाकिस्तानी क्रिकेटर अपने सरल एवं सौम्य व्यवहार के लिए जाने जाते थे। अपुष्ट खबरों के अनुसार आईएसआईका पाकिस्तानी क्रिकेटरों पर कुछ नई उपलब्धी राष्ट्र के नाम हासिल करने का दबाव था। आएसआई का मानना था कि श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर गोलीबारी की घटना काफी पुरानी हो चुकी है। और विष्व कप भी भारत जीत कर ले गया। ऐसे में कोई नई उपलब्धि हासिल करने की एकदम इमरजेंसी थी। सीमा पार से भी पाकिस्तानी सेना सीमापार से भी उतनी धुआंधार गोलीबारी नहीं कर पा रही है। क्योंकि अमेरिका पहले की तरह खामोष नहीं बैठता। ऐेसे में इज्जत बचेगी तो कैसे ? तालिबान को भी पाकिस्तान खुलेआम समर्थन नहीं दे पा रहा था। ऐसे में पाकिस्तान के सामने नाक बचाने का प्रष्न खड़ा हो गया था।
अपुष्ट खबरों के अनुसार राष्ट्रªपति जरदारी ने सेना प्रमुख कयानी के दबाव में पाकिस्तानी क्रिकेटरों को इस उपलब्धि पर बधायी दी है। कहा जा रहा है कि अगर जरदारी ऐसा नहीं करते तो उनका तख्ता पलट होना निष्चित था।

सुख-दुख एक हीं सिक्के के दो पहलू हैं।

मैं घोर भाग्यवादी हूं। मेरा मानना है इनसान के जो भाग्य में होगा वह मिलेगा हीं, चाहे वह हाथ-पर हाथ धरा क्यों न रहे। कहा भी गया है कि जब ईष्वर देता है तो छप्पर फाड़कर देता है। मैं छप्पर फटने का इंतजार कर रहा हूं। लेकिन मेरे इंतजार को ,मेरी पत्नी मेरा आलसीपन मानती है। आखिर क्यों न माने, तुलसी बाबा पहले हीं लिख गये हैं, जाकी रही भावना जैसी, हरी मूरत देखी वह तैसी। मैं भाग्यवादी  होने के साथ गहरे अर्थों में अध्यात्मिक भी हूं। मै ज्ञानीजनों के इस बात से सहमत हैं कि सुख- दुख मिश्रित है, अर्थात सुख के बाद दुख, दुख के बाद सुख। पर मेरी पत्नी मुझे ज्ञानी नहीं मानती। पड़ोसियों की नजर में भी मैं गंवार हूं।  मानेगी भी कैसे, कहा भी गया है, घर की मुर्गी दाल बराबर। जब लोग तुलसीदास की तरह मुझे घर- घर पूजने लगेंगे, तब सबको मेरी महानता मालूम होगी। तब न पत्नी मुझे भाव देगी। तब न पड़ोसी मेरे यहां दरबार लगाएंगे। फिलहाल पत्नी की नजर में मैं आरातलबी हूं, आलसी हूं, निकम्मा हूं, तभी तो मैं  ज्यादा कमाना नहीं चाहता । जबकी मेरा जीवन दर्षन यह है कि यह दुनिया दो दिन का मेला है। इस दो दिन की जींदगी में हाय हाय क्या करना।  मौज मस्ती कर लिया जाए। कौन मकान और घर लेकर इस संसार से जाता है। सिकन्दर भी तो खाली हाथ हीं गया था। मेरे पत्नी को अभी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुयी है, कोई बात नहीं हो जाएगी, क्योंकि उसको ज्ञानी पति जो मिला है।  मैं हूं न उसको उपदेष पिलाने को ा  आखिर मेरा ज्ञान किस काम आयेगा। वह ज्ञान किस काम का जो अपने के हीं काम न आए। लेकिन मेरे प्रवचन से परिवार की षांति व्यवस्था को खतरा भी उत्पन्न हो सकता है। लाठी चार्ज की भी नौबत आ सकती है। लेकिन इससे क्या मुझे उपदेष नहीं देना चाहिए। खतरा किस काम में नहीं ? क्या बिना खतरा उठाये आज की दुनिया में कुछ हो सकता है। मेरे प्रवचन के दौरान बेलन एवं झाड़ू बरसने की प्रबल संभावना है। लेकिन अगर मैं झाड़ू से डर जाऊंगा तो क्या कायर नहीं कहलाऊंगा। उसे समझाना भी तो मेरा फर्ज है। मैं झाड़ू बेलन से डरता नहीं,  क्योंकि मैं सत्याग्रही हूं सत्याग्रह करना जानता हूं। रामलीला मैदान में लाठी डंडा खा चुका हूं। छात्र जीवन में पुलिस वाले के हाथों में पिटा चुका हूं। कोई पहली बार नहीं मेरे साथ यह हादसा होगा। दूसरी बात यह है कि वह नासमझ है कि ,जो पति परमेष्वर पर हाथ उठायेगी, लेकिन मैं तो ज्ञानी हूं न। मैं हाथ नहीं उठाऊंगा। वरना किस मुंह से उससे खुद को बड़ा कहुंगा। उसके और मुझमें फिर अंतर हीं क्या रह जाएगा। मैं उससे उम्र में एवं अनुभव दोनों में बडा हूं।  उसे समझाना मेरा फर्ज है। उसे कर्तव्यबोध कराना जरूरी है। मेरा ज्ञान कह रहा है कि मेरी पत्नी माया के वषीभूत है ,वह ज्यादा धन मुझसे कमवाकर अपने अहंकार का विस्तार करना चाहती है। अपने सहेलियों में प्रभाव जमाना चाहती है। पड़ोसियों को जलाना चाहती है। लेकिन मैं ऐसा होने दूंगा। उसको माया में पड़़ने नहीं दूंगा। आखिर मैं उसका पति हूं उसका हित-अनहित सोंचना मेरा कर्तव्य है।  अगर मैं नहीं सोचूंगा तो आखिर दुनिया क्या कहेगी। न मैं ज्यादा कमाऊंगा और न उसे किसी चीज का अहंकार होगा। न वह पड़ोसियों का जलायेगी। वह नहीं पढ़ी है तो क्या। मैं तो पढ़ा-लिखा हूं न। मैं यह पढ़ा हूं कि  साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय मैं भी भूखा ना रहूं साधु न भूखा जाय। आखिर मैने उससे जनम- जनम साथ निभाने का वादा किया है। उसके प्रति भी तो मेरा कुछ कर्तव्य बनता है।
उसे यह नहीं पता है कि दुख के बाद सुख का अहसास होता है। वह केवल सुख हीं सुख चाहती है ,अगर मैं केवल उसे सुख के हीं वातावरण में रख दूं तो क्या वह उब नहीं जाएगी।  फिर उसे असली सुख का अहसास कैसे होगा। वह चाहती है कि मैं कुछ कमाकर बाल- बच्चों के लिए रखूं। सब तो रख हीं रहे हैं। मैं क्यों माया में पड़ूं। क्यों न मैं कुछ अलग करूं। मेरी बचपन से इच्छा कुछ अलग करने की रही है। सो मैं कुछ अलग कर रहा हूं। अपने बच्चों को कुछ कमाकर नहीं रख रहा हूं। और घर का माल उड़ा रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चेे स्वयं स्वालंबी बने। अगर सब मैं हीं कर दूंगा तो वे क्या करेंगे। उन्हें करने के लिये भी तो कुछ चाहिये वरना वे मेरे जैसे बैठे बैठे रोटी तोड़ेंगे। इससे उनका जीवन बेमजा हो जाएगा। फिर उनकी प्रतिभा कैसे निखरेगी। चुनौतियों का सामना करने से न।   ओषो ने कहा था कि काॅपी का उतना महत्व नहीं यूनिक चीज हीं मूल्यवान होती है। इसलीये मैं यूनिक बन रहा हूं। ठीक कर रहा हूं न ?






मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

जलवायु परिवर्तन ऐसे रोकें।

 जलवायु परिवर्तन को रोकना असंभव नहीं, अगर विकाषील राष्ट्र  विकसित देषों के सुझावों पर अमल करंे तो। विकसित देषों के सुझावों पर अमल कर जलवायु परिवर्तन को आसानी से रोका जा सकता है। विकसित देषों का कहना है कि विकासील देष अगर हानिकारक गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगा देंगे, तो विकसित देष चाहे कितना भी हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कर लें उससे क्लाइमेट चेन्ज नहीं होगा। इसको इस तरह से समझा जा सकता है। जिस प्रकार परमाणु क्लब में षामील राष्ट्रों को छोड़कर अन्य देषों के परमाणु हथियार बनाने से हथियारों की होड़ षुरू हो जाएगी। लेकिन परमाण राष्ट्रों के अपने परमाणु हथियारों के खत्म किए बिना हीं विष्व से परमाणु हथियारों का खात्मा माना जाएगा। जैसे कि अमेरिका के नेतृत्व में नाटों देष चाहे दूसरे देषों पर कितना भी बम बरसा लें उस  देष की संप्रुभता पर कोई खतरा उत्पन्न नहीं होगा। लेकिन अगर भारत पाकिस्तान को आतंकवादी गतिविधियों से बाज आने की चेतावनी भी दे दे तो साउथ एषिया का षक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा।  षांति व्यवस्था खतरे में पड़ जायेगी। हथियारों की होड़ षुरू हो जाएगी। अमेरिकी विदेष मंत्री का दौरा षुरू हो जाएगा। भारत को संयम रखने का उपदेष पिलाया जाएगा। इसको इस तरह से भी कहा जा सकता है कि परमाणु हथियारों से सम्पन्न राष्ट्र चाहे जितना परमाणु हथियार बनाना लें, विष्व के सुरक्षा व्यवस्था को कोई खतरा नहीं उत्पन्न होगा। और कोई देष बनाने की कोषिष करे तोे खतरा हीं खतरा नजर आएगा। जिस प्रकार विकाषील राष्ट्ों द्वारा अपने  किसानों को दी जाने वाली सब्सीडी कम या बंद कर देने से विष्व से मंदी दूर हो जायेगी। विष्व व्यापार संतुलित हो जाएगा। जिस प्रकार ओसामा के मारे जाने से विष्व से आतंकवाद खत्म हो जाएगा। जिस प्रकार आरक्षण लागू कर देने से समाज के एक वर्ग की किस्मत चमक जाएगी। दहेज कानून बन जाने से बहुओं की होली नहीं जलायी जाएगी आदि।
इसी को बात को विकसित राष्ट्रों ने एक मार्मिक अपील द्वारा विकाषील देषों को अपनी बात समझानी चाही है।
प्रस्तुत है उस अपील का सारांष-

विकसित राष्ट्रों की मार्मिक अपील - प्रिय विकाषील राष्ट्रों आप विकसित देषों की मांगों  पर उदारतपूर्वक विचार करें । चीन के कहा में मत आओ जी ,इतना निष्ठूर भी मत बनो जी। आखिर मानवता भी तो कुछ चीज होती है।  हमारी तुलना अपने आपसे क्यों करेते हो जी। हमें दुखों में रहने का कहां अनुभव है, लेकिन आपके साथ तो ऐसी बात नहीं है जी। हमें तो उपभोग का नषा है। लेकिन क्या आप के साथ भी ऐसा है। लोग कहते हैं कि पष्चिम उपभोग से उब चुका है। अब अध्यात्म की ओर लौट रहा है। लोगों की बातों में मत आओ जी। लोगों का तो काम है कहना। पुरानी आदत जल्दी कहां छुटती है। हमलोग एकदम मजबूर हैं जी।  लेकिन आप की धरती से तो संयम उपदेष गुंजा है। भारत जैसे देष में तोे पेड़-पौधों एवं नदियों तक को देवता कहा गया है। पर्यावरण का नुकसान पहंुचाकर अपने देवता का अपमान करोगे। आप पर्यावरण को नुकसान पहंुचाकर अपने देष का नाक मत कटवाइए। अपनी तुलना हमसे मत करो जी हम एडिक्ट हैं एडिक्षन इतनी जल्दी कहां छुटती है। आप षराब पीने वाले को कह दीजिए कि आज से वे षराब पीना छोड़ दें तो मुष्किल हो जाएगी जी। लेकिन आपने तो अभी षुरूआत की है जी, आप तो छोड़ सकते हो जी। इसलीए जलवायु परिवर्तन रोकने का जिम्मा ले लो जी। हमसे मत अपेक्षा रखो जी।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

नेताजी का चिंतन

उत्तर प्रदेष चुनाव किसी के लिए राजयोग लेकर आया है तो किसी के लिए स्वाथ्यय योग। तो अनेकों के लिए कंगालयोग भी । राजयोग एवं कंगाल योग की चर्चा बाद में होगी। आइए पहले हम  स्वास्थ्य योग की चर्चा करता करते हैं। लफुआ एंड कंपनी की एक रिपोर्ट के अनुसार देष के ज्यादातर वीआईपी हैवी वेट के षिकार हंै। चाहे मंत्री हो, सांसद हों, विधायक हों, या फिर अधिकारी सभी की एक हीं बीमारी है। लेकिन आषा है कि इसमें से नेताओं की अधिकांष बीमारी का इलाज उत्तर प्रदेष चुनाव में हो जाएगा। कारण कि उनको इस चुनाव में खूब परिश्रम करना होगा। खूब पसीना बहाना होगा। परिणाम घोड्ढित होने पर षाॅक थेरेपी एवं हड्र्ढ थेरेपी दोनों हो जाएगी। झोलाछाप डाॅक्टरों का इसके विपरीत मत है। उनका कहना है कि उत्तर चुनाव के दौरान उनके सेहत में सुधार न होकर उनके स्वास्थ्य में गिरावट दर्ज की जायेगी। झोलाछाप डाॅक्टरों का तर्क है कि इसका कारण यह है कि चिंतन करके परिश्रम तो वे लोग पहले से कर रहे हैं। क्षेत्र भ्रमण उनके लिये ओवर डोज हो जायेगा। इस पर कुछ लोग चुटकी लेने से भी नहीं चूकते और कहते हैं कि आखिर नेताओं को चिंता नहीं होगी तो किसे होगी। आखिर घोटाले के तरीके जो उन्हें सोचना होता है। घोटाला करके बचाव जो करना होता है।  घोटाला करने वाला भी चिन्तित है और नहीं करने वाला भी। यह तो वह बात हुई न जो खाये वो भी पछताए जो न खाये वो भी पछताए। जिन्हें घोटाले नहीं करने का मौका मिला है वे भी चिंंितत हैं और जिन्हें मिला है वे भी चिन्तित हैं। मेरे क्षेत्र के नेताजी की इस बीमारी से हालत सीरियस है।  उनके लिए चिंता एवं चिंतन एक हीं है।
नेताजी की कर्मठता आलम यह है कि वे रात-दिन क्षेत्र के विकास के लिए चिंतित रहते हैं। चिंता से उनका वजन 65 किलो से 105 किलो का हो गया है। पिछले कुछ वड्र्ढों में क्षेत्र हित में वे इतना चिन्तित रहे हैं उन्हें पता हीं नहीं चला कि पांच साल कैसे गुजर गया। षुरू से उनकी इच्छा रही है कि ,उनके क्षेत्र का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो। इसके लिए पूरे पांच साल चिंतन किए हैं। उनका का कहना है कि क्षेत्र को विष्व मानचित्र पर लाने के लिये पांच साल का चिंतन काफी नहीं है। उन्हें पांच साल और मौका दिया जाना चाहिए। जनता आखिर नेताजी के त्याग को किस मूंह से भूलेगी कि उन्हें मौका नहीं देगी। चिंतन में निमग्न रहने के चलते वे पांच वड्र्ढ में पांच बार भी क्षेत्र में दर्षन नहीं दिये हैं।  लोग अब अखिंया हरिदर्षन की जगह नेताजी के दर्षन को प्यासी गा रहें हैं।  नेताजी ने पत्नी से साफ कर दिया है कि, जब वे जनता का हित चिंतन करते हों तो कोई उन्हें डिस्टर्ब न करे। आखिर जनता के हीं पुण्य प्रताप से वे फल-फूल रहे हैं। दिन दूनी रात चैगुनी उन्नति कर रहे हैं। पहले साईकिल पर चलते थे। अब कार एवं हवाई जहाज की षैर करते हैं।  उनका कहना है कि आज भी वे साइकिल पर चलना चाहते हैं लेकिन जनता की इज्जत का ख्याल कर ऐसा नहीं करते। आखिर जनता की नाक जो कट जाएगी उनके साइकिल पर चलने से। उनके चिंतन से भाभीजी यानी नेताजी की धर्मपत्नी जी डबल चिंतित हैं। भाभीजी के बार-बार अपील करने पर भी वे परिश्रम करना नहीं छोड़ते।  ज्यादा परिश्रम करने का नतीजा है कि वे हैवी वेट का षिकार हो गये हैं। और डायबीटीज जैसी बीमारी हो गयी है। वे डायबटीज का षिकार होकर इस मिथक को तोड़ दिए हैं कि डायबटीज परिश्रम करने वाले को नहीं होता। आखिर चिंतन परिश्रम में नहीं आता है तो किसमें आता है? आषा है कि उनके हित चिन्तन का परिणाम इस चुनाव में जरूर मिल जाएगा। इसके पहले भी कई रिकाॅड उनके नाम है। जैसे नैतिकता जैसी कोई चीज नहीं होती। सत्य मिथ्या कल्पना है आदि। इस चुनाव में वे जनता सेे वादा किये हैं कि अगर वे चुनाव जीत गये तो जनता के प्यार के कर्ज को चुका देंगे यानी तिहाड़ जाकर उनका नाम रौषन कर देंगे। वे इस क्षेत्र के उपलब्धि में एक अध्याय जोड़ने के लिए प्रयासरत है। कामना कीजिए वे सफल हों।

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

मोदी का राजतिलक के लिए अनुष्ठान।

विगत दिनों मोदी के एक बाद एक उपवास ने मुझे इस निष्कड्र्ढ पर पहंुचने को मजबूर कर दिया कि ,अगर अन्ना के आंदोलन ने सबसे ज्यादा किसी को प्रभावित किया है तो वह हैं नरेन्द्र मोदी। भले हीं लाखो लोग अन्ना के समर्थन में सड़कों पर उतर आयें हों। या मैं हूं अन्ना तू है अन्ना का लोग गीत गायें हों, लेकिन नरेन्द्र मोदी के आगे सब फीके हैं। भले अन्ना अरबिंद केजरीवाल या किरन बेदी को अपना नजदीक बताएं या कोई अन्य उनके आगे-पीछे मड़राए। लेकिन नरेन्द्र मोदी उनके सबसे अधिक करीबी हैंैं, क्योंकि वे उनके आंदोलन को अबतक जीवित रखे हुए हैं। वे उनके अनषन से इतना अधिक प्रभावित हुए हैं कि उनका महीने का आधा दिन उपवास में बीत रहा है। वैसे मैं भी अन्ना के उपवास से कम प्रभावित नहीं हुआ था, लेकिन निगमानंदजी का हाल देखने के बाद मैंने अनषन न करने में हीं अपनी भलाई समझी। मुझे लगा कि उनकी तो लोग खबर भी पा गए, मेरे स्वर्ग सिधारने को लोग जान भी पाएंगे की नहीं। एक दूसरी बात भी मैं आपको बता दूं, कि मोदीजी के अनषन सेेे सबसे ज्यादा अगर कोई प्रभावित है तो वह हैं बघेलाजी। कांग्रेस को भले हीं बघेलाजी पर षक नहीं हो रहा हो, लेकिन मुझे तो हो रहा है जी क्योंकि बघेला जी मोदीजी के पद चिन्हों पर चल रहे हैं। कभी भी बघेलाजी एवं मोदीजी मिल सकते हैं। इतिहास कभी भी इस सदी की सबसे बड़ी दुर्घटना का साक्षी बन सकता है। और इस दुर्घटना के बाद मोदीजी बघेलाजी के षिष्य बनेंगे कि बघेलाजी मोदीजी के, मैं कुछ कह नहीं सकता । मोदी के विरोधियों का कहना है कि उनका अनषन राजतिलक के लिए हो रहा है। मुझे यह नहीं पता कि वे अनुष्ठान कर रहे हैं या आत्मषुद्धि या फिर आडवाणी जी कोे किनारे लगाने के  लिए कुछ और। कुछ लोगों का कहना है कि उनमें अषोक की तरह  वैराग्य का भाव आ चुका है।
अगर वो राजतिलक के लिए अनुष्ठान करा रहे हैं तो आडवाणी जी चिंतित हों , गडकरी जी चिंतित हों, सुड्ढमा जी चिंतत हों, जेटलीजी चिन्तित हों। कांग्रेस में राहुलजी चिंतित हों, सोेनिया जी चिन्तित हों,  मनमोहन सिंह चिंतित होकर क्या करेंगे।
मेरा काम सूचना देना है, आप माने या ना माने चेते या ना चेते । ये आपकी मर्जी। यह कांग्रेस या भाजपा का सरदर्द है। मेरा नहीं। कुछ दिन पूर्व मोदीजी के साथ श्री-श्री मुलाकात के बाद भी मुझे कुुछ-कुछ होने लगा था। आडवाणी जो को हुआ था कि नहीं।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

समझावन गुरू

ईष्वर प्रत्येक व्यक्ति को षक्ति सम्पन्न बनाता है। किसी के साथ अन्याय नहीं करता। यह अलग बात है कि कोई उसकी दी हुई क्षमताओं का उपयोग कर पाता है और कोई नहीं। यह अपनी क्षमताओं का उपयोग हीं करना है कि कोई किसी को करोड़ो का चूना लगा देता है और कोई मूंह ताकता रह जाता है। यह क्षमता की हीं बात है कि कोई हीरा की चोरी कर मौज करता है और कोई खीरे के चोरी के आरोप में जेल की हवा खाता है। किसी को जेल में भी पकवान मिलता है तो कोई घर पर भी भूखों मरता है। अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार कोई इंजीनियर बन जाता है तो कोई डाॅक्टर बन जाता है।  उसमें से विषेड्ढ प्रतिभावान इंजीनियर  दुष्मन देष को टेक्नोलाॅजी बेंचने लगते हैं और विषेड्ढ प्रतिभा सम्पन्न डाॅक्टर किड़नी बेंच कर लोगों का दूख दूर करने लगते हैं। इसी प्रकार अतिविषेड्ढ तेलगी और हड्र्ढद मेहता बन जाते हैं। अमर सिंह जी और कलमाड़ीजी आदि भी विषेष क्षेत्र के विषेड्ढ प्रतिभावान हैं। मुझे भी एक विषेड्ढ प्रतिभासम्पन्न के सानिध्य में रहने का सौभाग्य मिल चुका है, जिसके बारे में मेरा दावा है कि  आज नहीं कल वे अपने व समझाने की क्षमता के चलते पूरे विष्व में जाने जाएंगे। आइए उनके बारे में थोड़ा बात करते हैं। यह षख्स अपनी समझाने की क्षमता के चलते अपनी बीवी से लेकर आॅफिस के कर्मचारी के दिलों पर राज करता है। अपनी बीबी से वह 20 साल बड़े थे। लेकिन उन्होंने उसे ऐसा समझाया कि घर से बगावत कर बैठी। वह केवल उनके नाम की माला जपने लगी। माता-पिता के समझाने का कोई असर नहीं हुआ। फिर क्या था परिवारवालों ने चट मगनी पट षादी कर दी तब जाकर बगावत थमी।
 मेरा तो पक्का विष्वास है कि अगर उनके समझाने की क्षमता का उपयोग किया जाए तो पाकिस्तान आतंकवादियों को भेंजना भूल जाये। और चीन अरूणाचल में घुसना भूल जाए। अगर अन्ना समझावन गुरू के प्रतिभा को उपयोग करते तो उन्हें 13 दिनों तक अनषन नहीं करना पड़ता और नहीं रामदेवजी को डंडे खाने पड़ते। अभी भी समय नहीं गुजरा अन्ना एण्ड कम्पनी यह समझे कि  कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करने से नहीं, समझावनगुरू की सेवा लेने से लोकपाल बिल पास होगा। अगर अन्ना हजारे एवं बाबा रामदेव को समझाने के लिए समझावन गुरू को भेंजा गया होता तो  सरकार को इतनी फजीहत नहीं हुई होती। सरकार की गलती यह रही गई कि उसने कपिल सिब्बल जैसे नेताओं की प्रतिभा पर भरोसा किया। जो केवल अब तक स्वामी अग्निवेष को समझा पाये हैं।  रामदेवजी को नहीं समझाने के कारण सरकार को  रामलीला मैदान जैसा अलोकप्रिय कदम उठाना पड़ा।

आइए हम समझावन गुरू के साथ अपने स्वयं के अनुभव कोे साझा करते हैं। बात उन दिनों की है जब मैं उनके यहां नौकरी करता था। मैडम तो अक्सर टूर पर रहती थीं। समझावन गुरू के हवाले हीं आॅफिस से लेकर फील्ड की देख- रेख था। सुबह हमलोगों को फील्ड में एक-दो घंटे कार्य के बाद कोई कार्म काम नहीं बचता था। लेकिन समझावन गुरू हमें मुफ्त की रोटी तोड़ना नहीं देना चाहते थे। इसलिए सुबह से लेकर षाम तक समझाते थे।
वह हमलोगों घर में समझाते । बाग में समझाते । आॅफिस में समझाते। कोर्ट पहनकर समझाते। टाई लगाकर समझाते, लुंगी बहनकर समझाते। माइक हाथ में लेकर समझाते। सोते हुए समझाते। बैठते हुए समझाते। कविता कहकर समझाते। गाना गाकर समझाते। चाय पिलाकर समझाते,  खाना खिलाकर समझाते थे।  हम लोगों का आठ घंटा का कार्य समझना था और उनका काम समझाना था। हमलोग समझने के बदले पगार पाते थे। और वो मैडम का प्यार या दुत्कार। लोगों का कहना था कि हमदोनों अर्द्ध बेरोजगार थे। आपका क्या कहना है ?
वैसे समझावन गुरू के प्रतिभा को पहचाना जाने लगा है। और पहला आॅफर स्वर्ग लोक से आया है। खबरों के अनुसार स्वर्ग से भारत रत्न नहीं  पाने वाली कुछ अतृप्त आत्माओं ने उनसे संपर्क किया है और कहा है कि जीते जी न सही मरणोपरांत  भारत रत्न देने के लिए सरकार को तो समझा हीं दो। वैसे  ओबामा की ओर से भी उन्हें आॅफर आया है कि दोबारा राष्टपति बनाने के अमेरिकी जनता को वे समझायें। मेरा राजनेताओं से भी कहना है कि समझावन गुरू की सेवा लीजिए जूते की जगह फूल बरसने लगेंगे।


गुरुवार, 24 नवंबर 2011

इन्द्र का विलाप


इन्द्र का भगवान विष्णु के घर आगमन। त्राही माम् त्राही माम् कहकर उनके चरणों में लोट जाना। भगवान का आष्चर्य चकित होना और सोचना आखिर इन्द्र को यह क्या हो गया है। बचाओ -बचाओ का स्वर फिर इन्द्र के मुंह से फूट पड़ना। क्या हुआ इंद्र किससे तुम्हें बचाऊं। यहां तो नारद के सिवाय कोई नहीं है।  वो भी अपने स्वभाव के विपरीत चुपचाप बैठे हैं। फिर कुछ सोचकर इन्द्र राक्षस फिर से आक्रमण कर दिए हैं क्या? । नहीं भगवान मृत्युलोक के लोग घनघोर तपस्या कर रहें । उनके तपस्या से जब मेरा इंद्रासन डोलने लगा तो मै आपके पास दौड़ा चला आया। आखिर आपहीं तो मेरा आश्रयदाता हैं। माई-बाप हैं। मेरी हर मुष्किल घड़ी में आखिर आपहीं ने तो साथ दिया है। सच है जगत के और संबंध मिथ्या है। प्रभु से प्रीत लगाने में हीं जीव की सार्थकता है। फिर इन्द्र ने षंका जाहिर किया लगता है भगवन वे इन्द्रासन पर कब्जा करने के लिए तपस्या कर रहे हैं। व्रत एवं उपवास कर रहे हैं। खासकर नरेन्द्र मोदी जी एवं बघेला जी से मैं खाषा चिन्तित हूं। वे दोनो प्रतिस्पर्धा पर व्रत एवं उपवास कर रहे। यहीं नहीं उत्तर प्रदेष में भी नेता थोक के भाव में अनुष्ठान करा रहे हैं। स्थिति यहां तक पहंुच चुकी है कि पंडितों की एडवांस बुकिंग हो गयी है। सामान्य भक्तों को पूजा-पाठ कराना मुष्किल हो रहा है। राजनेताओं के घर अनुष्ठान को देखकर, मुझे प्रतीत हुआ कि यह राजसत्ता के लिए हीं हो रहा होगा। वो आपको पाने के लिए थोड़े अनुष्ठान कर रहे हैं।  हे नटवर मेरा डर काल्पिक कैसे हो सकता है। अगर नेता चुनाव के वक्त अनुष्ठान करा रहा है तो वह राजसत्ता के लिए करा रहा होगा न। वैसे भी नेताओं की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं से आज परचित कौन नहीं है। नेताओं के बढ़ती महत्वाकांक्षा से मैं विषेड्ढ चिंतित हूं नटवर। वे जेल यात्रा को इतना सहज ले रहे हैं,  मानो जेल नहीं किसी पर्यटन स्थल पर जा रहे हों।  । इससे मेरी चिंता और बढ़ गयी है मुरली मनोहर। मैं यह सोचकर भयभीत हूं कि अगर कभी वे आपसे इन्दासन मांग लिए । और आपने प्रसन्न होकर उन्हें दे दिया तो मेरा क्या होगा कृष्ण कन्हैया। क्या ऐषो -आराम के बिना मैं एक दिन भी रह सकूंगा। यहीं सोंचकर हमें नीद नहीं आ रही है दुनिया के दाता। यहीं नहीं नटवर उनकी बीबीयां भी आपको मनाने के लिए अनुष्ठान कर रही हैं। ऐसे में मेरा डरना स्वभाविक है कि नहीं। आखिर नारी षक्ति के आगे हर कोई नतमस्तक हुआ है। आपभी हो सकते हैं। दूसरी बात सामुहिक पूजन का फल भी अधिक कहा गया है। मुझे डर है भगवन कहीं आप जनमत से प्रभावित न हो जाएं। ठीक वैसे जैसे धरती पर नेता बहुमत को ध्यान में रखकर हर फैसले लेते हैं। वैसे भी आप सरल हृदय हैं आपको लोग  बहला फुसला जल्दी लेते हैं। इसलिए उत्तर प्रदेष चुनाव तक कृपया आप मुझे अपने साथ रखें।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

नीतीश भयग्रस्त हैं

खबर है कि सुषासन बाबू भयग्रस्त हैं। और इस कारण वे अति व्यस्त हैं।  धड़ाधड़ विकास कार्यो में तल्लीन हैं। उनके व्यस्तता से लगता है चुनाव उत्तर प्रदेष में न होकर बिहार में हो रहा है। इतना तो बहन मायावती भी नहीं व्यस्त हैं, जिनके राज्य में चुनाव होने जा रहा है। उनके विरोधियों का कहना है कि अगर वह भयग्रस्त नहीं होते तो पटना में बैठकर सत्तासुख भोगते, राज्य में घूम-घूमकर उपद्रव नहीं करते। हालांकि बहन मायावती भी व्यस्त हैं । लेकिन वे दूसरी तरह से व्यस्त हैं। वे पार्कों एवं मुर्तियों के उद्घाटन एवं निर्माण में व्यस्त हैं। मंत्रियों का क्लास लेने में व्यस्त हैं। नीतीष कुमार को लग रहा है कि वे अभी से व्यस्त नहीं रहेंगे तो लालू अतिव्यस्त होकर कहीं जनता का कान न भर  देेें। फिर तख्तापलट में देर नहीं लगेगी, कारण कि जनता विकास कार्य को भूल जाती है। जाति को याद रखती है। लेकिन नीतीष के व्यस्त होने से राज्य के अधिकार एवं बाबू त्रस्त हैं। कारण कि वे अपनी वीवीयों के यहां टाइम से हाजिरी नहीं दे पा रहे हैं। आधिकारियों को वीवीयों और नीतीष दोनों की डाॅट सहनी पड़ रही है।  नीतीषजी अधिकारियों को उपदेष पिलाने में व्यस्त हैं तो अधिकारी बाबूओं को हड़काने में व्यस्त हैं। नीतीष व्यस्तता में थोक के भाव में आदेष दे रहें ,जिसको वे देर राततक पूरा नहीं कर पा रहे हैं। वे षेड्ढ कार्यों को सपनों में निपटा रहे हैं। विरोधियों का कहना है कि जिस राज्य में व्यक्ति को सपनों में भी स्वतंत्रता प्राप्त न हो, उसे तानाषाही कहना ठीक होगा, सुषासन नहीं।
यह भी कहा जा रहा है कि  लालू का भूत अभी नीतीष का पीछा नहीं छोड़ रहा है। विक्कीलीक्स के खुलासे के अनुसार मुख्यमंत्री रात में सोते वक्त बार-बार जाग जाते हैं। कारण कि वे स्वप्न में लालू यादव को अपनी कुर्सी पर बैठा पाते हैं।
एक दुसरी खबर के अनुसार वे जब कभी फुर्सत में रहते हैं। तो दूसरे लोक में गमन करने लगते हैंैं और लालू यादव के मुख्यमंत्री के कुर्सी पर बैठे रहने के बारे में मनन करने लगते हैं, और उसके बाद उनके मुंह से बरबस निकल पड़ता है, कभी कुर्सीं छूट गई तो हम जीकर क्या करेंगे।
बस इसी गम को भुलाने के लिए राज्य का ताबड़तोड़ दौरा कर रहे हैं।
ऐसा नहीं केवल नीतीष व्यस्त हैं। नरेंद्र मोदी भी व्यस्त हैं। सूत्रों के अनुसार मोदी व्यस्त हैं इसलिए नीतीष भी व्यस्त हैं। हालांकि कुछ लोगों का इसके उल्टा भी कहना है।
एक अन्य खबर के अनुसार नीतीष कुमार नरेंद्र मोदी के चुनौती को स्वीकार करके व्यस्त हैं न कि लालू यादव के कारण व्यस्त हैं। नरेंद्र मोदी को अंगया देकर बीजे गायब करने के बाद मोदी ने  नीतीष को गुजरात की तरह विकास करके दिखाओ की चुनौती दी थी, जिसे नीतीष ने सहड्र्ढ स्वीकार लिया था और उसी समय से व्यस्त हो गये थे। लेकिन बीजेपी नेताओं ने मोदी को खूब कोसा था कि उनके कारण, वे नीतीष के ब्रम्हभोज से वंचित रह गए।
सूत्रों के अनुसार अमेरिकी प्रषासन द्वारा मोदी की तारीफ से और टाइम मैगजीन द्वारा नीतीष की तारीफ से दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा चरम पर पहुुंच गयी है।


प्रसिद्ध राजनीतिक विष्लेड्ढक लालू यादव का कहना है कि अगर नीतीष इसी तरह अधिकारियों को व्यस्त रखे तो राज्य को सौ साल पीछे जाने से कोई नहीं रोक पाएगा। उनका कहना है कि अधिकारी दबाव में जी रहे हैं। उनका कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। वे कार्य स्थल पर हीं सो जा रहे हैं।

मुझे कुर्सी दे दो नाथ।

हे कृपा निधान , हे भगवान, मैं अपने आपको तुम्हें समर्पित कर रहा हूं। कृपया मुझे कुर्सी दे दो नाथ। फिर जीवन भर जोडूंगा तेरा हाथ। हे नाथ तुने सबकी इच्छाओं को पूरा किया है। तेरी कृपा से लंगड़ा पर्वत चढ़ जाता है ,अंधा देखने लगता है, बहरा सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है। तेरी कृपा मात्र से आदमी को क्या कुछ नहीं मिल जाता है। हे नटवर तुमने अपने भक्तों को यह बचन दिया था कि  तेरी षरण में जो आ जाता है, उसके तुम सारे दुख हर लेते हो । उसे तुम मनोवांछित फल प्रदान कर देते हो। तुमने भक्तों से अहंकार छोड़ने को कहा है, मैंने अहंकार छोड़ दिया है। मैं अब तुम्हारी षरण में हूं। मैं अपने बल पर यह चुनाव नहीं जीत सकता नटवर। तुम भक्तों के कल्याण के लिए धरती पर जन्म तक ग्रहण कर लेते हो। क्या तुम मेरी चुनावी नैया पार करने के लिए एक चमत्कार तक नहीं कर सकते। तुमने दूसरे के भलाई के बारे में सोंचने को कहा था, इसलिए मै दूसरे के बारे में सोच रहा हूं। मेरे विरूद्ध चुनाव लड़ रहा षख्स माया केे वषीभूत है नाथ। उसे हित अनहित का ध्यान नहीं है। मैं नहीं चाहता कि वह चुनाव लड़कर माया के अधीन हो। इसलिए उसे माया से दूर करना चाहता हूं। पर वह मेरी सुनता हीं नहीं। चुनाव में मुझसे जो उसकी बढ़त दिखाई दे रही है वह क्षणिक सुख है। जिसे वह स्थायी समझने की भुल कर रहा है। मैं नहीं चाहता कि मेरा विरोधी माया ग्रस्त हो। माया बड़ी बलवती है। जब वह भगवान को नहीं छोड़ती तो भला उसे कैसे छोड़ेगी। उसे तुम माया से मुक्त कर दो नाथ। वह मेरी बात नहीं सुन रहा है नटवर। मैंे उसे षाम- दाम -दंड- भेद दिखाकर थक गया हूं। वह नहीं माना। अब तुमपर हीं आस टिकी है ,तेरी कृपा पर हीं मेरी सास टिकी है।  हे कृष्ण कन्हैया तुम मुझे मेरे विरोधियों से मुक्ति प्रदान कर दो। उसे तुम त्याग का उपदेष पिला दो। उसे तुम बता दो कि यह जीवन नष्वर है।  इसके लिए मोहग्रस्त होना कहां की बुद्धिमानी है? इसके लिए वह क्यों माया- मोह कर रहा हैं । वह क्यों दूसरे के हक को छीनने की कोषिष कर रह है। क्यों सांसारिकता में उलझ रहा है। अन्त समय कोई उसके साथ नहीं जाएगा। उन्हें यह बता दो कि सिंकन्दर विष्व विजयी होकर भी इस संसार से खाली हाथ हीं गया था। उसे तुम यह बता दो कि हर जीव में वह खुद को देखेगा तो उसका द्वैत मिट जाएगा, दूसरे की उपलब्धि अपनी नजर आएगी। फिर उसे चुनाव लड़ने कि आवष्यकता हीं नहीं महसूस होगी। मैं चुनाव हार कर कहां मंुह दिखाउंगा कृष्ण कन्हैया। इसलिए सन्यास ले लूंगा। लेकिन मेरा सन्यास मजबूरी में लिया गया होगा। क्या यह कायरता नहीं होगी ? क्या यह अध्यात्म के मूल सिद्धान्त के विरूद्ध नहीं होगा? अध्यात्म की पुस्तकों में कहा गया है कि, सन्यास का भाव हृदय से उठना चाहिए। और सन्यास गृहस्थ आश्रम में रहकर भी फलीभूत हो सकता है। समस्याओं से भागकर जंगल चले जाना भगेड़ूपन है। मेरी लाज अब तेरे हाथ में है गिरिधर। और तेरी लाज मेरे हाथों में, क्योंकि अगर यह चुनाव मैं हार गया, तो तुम्हारे इस कथन पर कोई विष्वास नहीं करेगा, कि जो अपने आपको तुम्हें समर्पित कर देता है, उसके तुम सारे कष्ट दूर कर देते हो।

श्री श्री रथ पर सवार चले रे।


सब लोग टीवी पर नजर गड़ाए हंै। टीवी पर खबरें प्रसारित हो रही है। खबरें भगवान विष्णु को व्यग्र कर रही है। भगवान ंिचंता के मारे कमरे में चहल कदमी षुरू कर दिए हैं। लोगों को यह नहीं समझ में आ रहा है, कि भगवान इतना व्यग्र क्यों हो रहे हैं। समाचारवाचक ने ऐसी कौन सी खबर सुना दी, जिससे भगवान व्यग्र हो गये। श्री श्री रथ हीं तो निकाल रहे हैं। आडवाणी जी ने भी तो रथ निकाला था, रामदेवजी ने भी तो निकाला था तब तो भगवान इतना व्यग्र नहीं हुए थे। श्री श्री तो उनके भक्त हैं। उनके लिए तो यह खुषी की बात होनी चाहिए , कि श्री श्री रथ पर सवार होकर उत्तर प्रदेष का भ्रमण कर रहे हैं।  उनका एक भक्त तरक्की कर रहा है। आॅलराउंडर बन रहा है।  उपलब्धि हासिल कर रहा है।  क्या भगवान भी सामान्यजन की तरह ईष्या एवं द्वेष के वषीभूत हैं? क्या भगवान को भी अपने भक्त की तरक्की पसंद नहीं है? वे तो भक्तों के कल्याण के लिए षरीर तक धारण कर लेते हैं। फिर श्री श्री का रथ पर सवार होना उनको क्यों नहीं सुहा रहा है। भगवान को यह रोग कब से लग गया? क्या मृत्युलोक के लोगों का प्रभाव उनपर पड़ रहा है।
अब भगवान के पदचाप के सिवा कमरे मंे एकदम सन्नाटा छाया है। कोई कुछ नहीं बोल रहा है। अन्ततः भगवान ने हीं चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि देखो न नारद आखिर श्री श्री भी माया के अधीन हो हीं गए। मुझे उनसे यह उम्मीद नहीं थी। अब भला बताओं ना नारद जब श्री श्री रथ की सवारी करेंगे तो अन्ना हजारे एवं सरकार में सुलह कौन कराएगा।  रामदेवजी को कौन जूस पिलाएगा। अन्ना एवं सरकार में सुलह कराने के लिए श्री श्री ने कितना प्रयास किया था। सरकार की रूख तो तुम देख हीं चुके हो। निगमानंदजी का क्या हश्र हुआ तुम जानते हीं हो। मुझे उन लोगों की चिंता है जो अनषन कर रहे हैं या भविष्य में करने वाले हैं। आखिर मै हीं तो सबका भरण-पोषण करता हूं। सबके हित में सोचता हूं। कहीं ऐसा न हो कि अनषनकारियों की कोई खोज- खबर हीं न ले। उनके अनषन तोड़वाने के लिए कोई पहल हीं न करे। श्री श्री निगमानंद जी का अनषन तोड़वाने का पहल नहीं किए तो थे तो क्या हुआ ? वीआईपी का अनषन तोड़वाने का जिम्मा तो ले हीं चुके हैं न। नहीं तो वो काम भी मुझे हीं करना पड़ता। वैसे भी मुझपर यह आरोप लग रहा है कि मैं पालकी वाले भक्तों का ज्यादा सुनता हूं। उनको कौन समझाये अगर मैं उनकी नहीं सुनुंगा तो क्या वे मेरी सुनेंगे। आखिर उनके पास किस चीज की कमी है। जो मुझे भाव देंगे। सामान्य भक्त मजबूर हैं मुझे याद रखने के लिए । लेकिन वीआईपी भक्तों की आखिर क्या मजबूरी है।
 नारद तो श्री श्री का जगह ले नहीं सकते। क्योंकि उनको तो मैं पहले हीं उत्तर प्रदेष चुनाव की रिर्पोटिंग की जिम्मदारी सौंप चुका हूं। उनके बिना तो सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। आखिर कौन मिर्च मसाला लगाकर खबरों को सुनाएगा।
 मैं श्री श्री को भी दोड्ढ नहीं दे सकता। आखिर सब बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं, तो उन्होंने धोकर कौन सा अपराध कर दिया है।  मैं श्री श्री को रोकने वाला भी कौन होता हूं। जो वो रथयात्रा निकालने से पहले  मुझसे पूछते। क्या श्री श्री रथ निकालने में समर्थ नहीं है। जो समर्थ होता है कहां मुझसे पूछता है। क्या रामदेव ने मुझसे पूछा था। क्या मैं रामदेव को रोक पाया था।
अगर मेरी बात रामदेव माने होते तो क्या उन्हें सलवार कमीज पहननी पड़ती। एक हीं झटके में वे गेरूवा वस्त्र को उतार फेंके होते । क्या उन्हें यह भान नहीं होता कि आत्मा अजर-अमर अविनाषी है। उसे कोई मार नहीं सकता, पानी गला नहीं सकती अग्नि जला नहीं सकती। उनका डर तो यहीं बता रहा है न कि वे अभी भी अपने को षरीर हीं मान रहे हैं।  अगर उन्हें मेरे उपर भरोसा होता तो न तो वे तम्बू के नीचे छूपते। न हीं औरतों एवं बच्चों की सुरक्षा घेरा बनाने की बात करते । हां मैं स्वामी अग्निवेष को अपना सच्चा षिष्य मानता हूं जो मेरे आदेष से इन दिनों बिग बाॅस में प्रवचन कर रहे हैं। वे श्री श्री का जगह ले सकते हैं।


शनिवार, 19 नवंबर 2011

परिवर्तन जीवन का अटल सत्य है।

 मेरे एक मित्र ने मुझसे पत्र लिखकर पूछा है कि मैं रोज अपना नाम क्यों बदलता हूंूं। इसपर मेरा कहना है कि भाई साहब आप मेरे षुभ चिन्तक हैं कि दुष्मन। क्या आप मुझे तरक्की करते  देखना नहीं चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि मैं एक हीं जगह स्थिर रहूं? आगे नहीं बढ़ूं। आसमान की बुलंदियों को टच न करूं। वैसे आपकी इसमें कोई गलती नहीं है। दरअसल आप आदर्षवादी किस्म के जीव है। आप जैसे लोगों को थोड़ा सा परिवर्तन भी पहाड़ सा लगता है। ऐसे जीव-जन्तु भीड़-भाड़ से दूर षांत वातावरण में रहना पसंद करते है। मेरी आपको सलाह है कि आप बर्हीमुखी बने। लोगों के साथ घुलने मिलने का प्रयास करें। इसके लिए आप कोई क्लब ज्वाइन करें या जूआ खेलनेे वाले से संगत कर लें। वीयरबार या तषेडि़यों या गंजेडि़यों के संगत से भी आपमें समाजिकता आ सकती है।  आप परिवर्तन कोे सहज रूप से लें। याद रखें आप इक्कीसवीं सदी में रह रहें। पाड्ढाण युग में नहीं कि किसी भी चीज  को बदलनें में हजार या लाख वड्र्ढ लगेगा। ऐसा प्रष्न आपको उपहास का पात्र हीं बनाएगा। कारण कि ऐसे प्रष्न आपके आधुनिक नहीं होने की निषानी है। जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलने की बानगी है। याद रखें अगर आप क्वारें हैं तो जीवन भर आप क्वांरें रह जाएंगे। भला ऐसे लड़के से कौन अपनी लड़की की षादी करेगा। जो 21वीं सदी में रहकर भी आदिम युग में जी रहा हो। ऐसा पति अपने आपको बीवी की इच्छा के अनुसार तेजी से बदल नहीं पाता।
 क्या वह सुबह उठकर बीवी को चाय बनाकर पिला पाएगा। अगर आप फिल्म देखते होंगे तो आप जानते होंगे कि फिल्मों के हीरो अपना नाम बदलते हैं। बहुत से ज्योतिड्ढियों को आपने यह दावा करते सुने होगें कि बस आप अपना नाम बदल दें ंहम आपकी किस्मत चमका देंगे। जगत का हर चीज परिवर्तनषील है। नदी की धारा प्रतिक्षण बदलती रहती है। स्थिरता भ्रम है, जबकि नवीनता हीं जीवन है। दूसरी बात यह है कि सृष्टि का प्रत्येक चीज परिवर्तनषील है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए आदमी को प्रतिक्षण बदलना पड़ता है। जो नहीं बदलता है वह अपना अस्तित्व खो देता है। विकासवाद का सिद्वान्त भी यहीं कहता है। जब नैतिक और सामाजिक मूल्य तेजी से बदल रहा हैं तो फिर आपको बदलने में क्यों परेषानी हो रही है। भाई साहब मेरा नाम बदलना आपको क्यों ब्रेकिंग न्यूज लग रहा है। यह बात मेरे समझ में नहीं आ रही है।
मेरे नाम बदलने में क्या रखा है। आज व्यक्ति अपना गांव और गांव की यादों को सहजता से भूल जा रहा है। मां-बाप के प्यार को भूल जा रहा है। ग्रर्लफ्रेन्ड रोज बदल रहा है। मूंछ मूडवाकर मोछमुडा बन जा रहा है। लड़कियों जैसा बाल बढ़ा रहा है। लड़का अपने को लड़की के रूप में दिखाना चाह रहा है और लड़की अपने को लड़के के रूप में। अब तो पति एवं पत्नी का बदलना फैषन हो गया है। नेता असानी से पार्टी बदलता है। जो जितना पार्टी बदलता है वह उतना फायदे में रहता है। एक हीं जाॅब करने से क्या आपको तरक्की मिलेगी। कभी बहुरूपिया लोगों का मनोरंजन का साधन हुआ करता था । आज हर कोई बहुरूपिया हो गया है, इसलिए बहुरूपिए में कोई रस नहीं रह गया है। कल तक लोगों को दलाल कहकर अपमानित किया जाता रहा है। आज दलाली कमाऊ पूत बन गया है। भला षेयर दलाल को कौन नहीं सम्मान से देखेगा। कल तक दलबदलू से पार्टियां दूर रहती थी क्योंकि अन्य सदस्यों को यह रोग लग सकता था लेकिन आज उनको पटाकर रखा जाता है, क्योंकि विपत्ति के वक्त वहीं काम आते है। नोटों की गडिडयां बंटवाते हैं। बहुमत जुटाते हैं।
 परिवर्तन से भगवान भी अछूते नहीं है, तो हमारे और आपमें क्या रखा है। आखिर एकहीं ईष्वर कभी राम बनकर तो  कभी ष्याम बनकर आते हैं।  परिवर्तन का महत्व नहीं होता तो क्या वे अपने भक्तों को एकहीं रूप नहीं दिखाते।
भगवान हीं नहीं भगवान के भक्त भी बदल गए हैं। पहले वे  नंगे पांव चलते थे। जगंल में रहते थे। कंदमल- फूूल खाते थे। जमीन पर सोते थे। गरीब-अमीर को समभाव से देखते थे। कामिनी कंचन से दूर रहते थे  तब जाकर भगवान प्रसन्न होते थे।
आज अगर वह पालकी में नहीं सवारी करेंगे, एयरकंडीषन में नहीं निवास करेंगे,  अमीरों पर अपना स्नेह नहीं बरसाएंगे,  कामीनी कंचन से दूर रहेंगे तो क्या वे भगवान पर कोई प्रभाव छोड़ पाएंगे।
 अध्यात्मिक व्यक्ति आप से कह सकता सकता है कि नाम रूप में क्या रखा है। लेकिन जानकार मानते हैं कि नाम और रूप में हीं सबकुछ है।

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

अपुन अमेरिका को महाशक्ति नहीं मानेगा

दिल्ली बम बिस्फोट के बाद काफी हो-हल्ला किया गया। मानो और विस्फोटों को सहने की हमारी क्षमता जवाब दे गयी हो। मानो राष्ट् पर बहुत बड़ा संकट आ गया हो। ऐसी हीं बाते विदेषियों में हमारी छवि को खराब करती है। जबकि ऐसे समय में संदेष यह दिया जाना चाहिए था कि इससे बड़े विस्फोटों को सहने में हम समर्थ। इससे बड़े विस्फोटों को सहने को हम तैयार हैं। विस्फोट के बाद यह टीवी पर बहस का मुख्य मुददा हो गया। चाय-पान की दुकानों पर बहस का मुख्य विड्ढय था। कुछ लोगों की नजर में एक साजिष के तहत इसे बहस का मुद्दा बनाया गया। नही तो यह बहस का मुददा था हीं नहीं जी। बम विस्फोट तो दुनिया भर में होता है। पचास-सौ लोग तो रोज ऐसे विस्फोट में मरते हैं। इससे इतना आतंकित होनेवाली क्या बात है? बम बिस्फोट को बहस मुददा बनाया जा रहा है उनलोगों द्वारा जिनके दिन की शुरूआत हीं बुद्वि बिलास द्वारा होती है। कहा यह जा रहा कि अन्ना के आंदोलन के समय से इस वर्ग की कुम्भकरणी निद्रा टूट चुकी है। स्वतंत्रता के बाद इस वर्ग ने लंबी छुट्टी ले ली थी। यह वर्ग रोटी कपडा मकान की चिंता से मुक्त है। इसलिए खाली मन में ऐसे विचार तो चलेगा हीं न। यह वही वर्ग है जो टीवी पर जमकर बहस करता है। अखबारों में लेख लिखता है। सेमिनारों में जमकर भड़ास निकालता है। और चुनावों में सबसे कम मतदान करके लोकतंत्र में अपनी गहरी आस्था भी व्यक्त करता है। इस वर्ग के लिए चुनावों में सक्रिय भाग लेना संकट मोल लेने जैसा है। वैसे अगर इन्हें नेता बनने का मौका दिया जाए तो इन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा। यह वर्ग अपनी निजता का ध्यान तो रखता हीं है दूसरे की निजता का भी ख्याल रखता है। यानी पड़ोसी के भूखा सोने या भूखा मरने पर उसकी कोई खोज खबर नहीं लेता। क्योंकि उसकी मदद कर देने से उसकी प्राइवेसी समाप्त हो जाएगी। वैसे हमारे राजनेताओं का परफॉरमेंस एकदम बेजोड़ रहा है। वह लोगों की आकंक्षाओं पर शतप्रतिशत खरे उतरे हैं। यहीं कारण है कि हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह मानने लगा है कि कोई नृप होय हमें का हानी। और लोकतंत्र के इस महापर्व के प्रति उनके मन में उदासीनता झलकने लगी है। पुलिस का कड़ा कदम नहीं उठाने के पीछे अपना हीं तर्क है। उसका कहना है कि नेता जब कठोर कदम उठाने से हिचक रहे हैं तो हम सबसे तेज बनके क्या करेंगे। आखिर हमारी लगाम तो उन्हीं के हाथों में रहती है। लोगों द्वारा यह भी कहा जा रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कदम नहीं उठाने के चलते हमारी छवि एक नरम राष्ट की बन गई है। ऐसा तर्क उन्हीं लोगों द्वारा दिया जा रहा है जो क्षमा के महत्व को नहीं जानते। मारने वाले से बचाने वाला महान होता है इसलिए हम अफजल गुरू को बचा रहे हैं।। क्षमा करके हम बड़प्पन का परिचय दे रहे हैं। करोड़ो की राषि उसपर खर्च करके हम अपने देष की अतिथिदेवो के परंपरा को मजबूत कर रहे हैं। हमारी संस्कृति में कष्ट सहने को तप कहा गया है। हमें नरम बताने वाले यह नहीं जानते कि कठोर कदम नही उठाने का मुख्य कारण यह है कि हम तप कर रहे हैं। इतने विस्फोंटों के आघात सहने के बाद भी क्या लोगों का संदेह है कि हम कमजोर हैं। हमारे तप यानी विस्फोटों के आघात सहने के कारण हमारी प्रषंसा होनी चाहिए। कष्टों का चुपचाप सहन करना तो हमें मजबूत साबित करता है। प्रतिउत्तर तो कमजोर देता है।। जैसा कि अमेरिका ने दिया था। अमेरिका को भले कोई महाषक्ति मानता हो लेकिन अपुन की नजर में वह एक कमजोर राष्ट् है। पेंटागन पर आक्रमण के बाद तो वह इतना डर गया कि उसे हर जगह ओसामा हीं ओसामा नजर आने लगा। और अन्ततः ओसामा को ठिकाने लगाकर हीं माना। पाकिस्तान को दो टूक सुना दिया कि दुष्मनी एवं दोस्ती में से कोई एक चुन लो। सड़क छाप व्यक्ति को भी आप तमाचा मारियेगा तो बदले में तमाचा मारेगा। जबकि बड़ा व्यक्ति अपना दूसरा गाल आगे बढ़ा देगा। अमेरिकी सुरक्षा एजेन्सियां हमारे मंत्रियो तक के कपड़े उतरवा लेती हैं। क्या यहीं उनका षिष्टाचार है। वे किस बात के सभ्य हैं। अरे सभ्य तो हम हैं जो संसद पर आक्रमण करने वाले तक को भी माफ कर देते हैं। मानवतादवाद के क्षेत्र में भी हमारा कोई षानी नहीं है। हमें क्या कोई मानवाअधिकार का पाठ पढ़ाएगा। सामान्यजन क्या हम आतंकवादियों के मानवाअधिकार भी रक्षा करते हें। देखना हो तो विभिन्न घोटाले के आरोप में जेल जाने वाले कैदियों का देख लो। कैसे वे जेलों में वे सारी सुख-सुविधाओं का भोग कर रहे हैं। गांधी के इस देष में कुछ लोग हिंसा को बढ़ावा देना चाहते हैं। यहीं कारण है कि वे आतंकवादियों के खिलाफ कड़ी कारवाई की मांग करते है। जिसका हमें हर हाल में विरोध करना चाहिए। हमें बताना होगा कि हम अहिंसा छोड़ने वाले नही हैं। हम उनके हृदय परिवर्तन तक इंतजार करेंगे। गांधी भले अंतिम विकल्प के रूप में हिंसा की अनुमती देते हों लेकिन हम नहीं देने वाले हैं जी।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2011

चुनावी सीजन में विशेष ऑफर

अगर आपके पास टीवी नहीं है और आप टीवी खरीदने का इरादा रखते हैं तो फिलहाल आप अपना इरादा टाल दीजिए। कारण कि हो सकता है कि टीवी आपको मुफ्त मिल जाए। जी हां उत्तर प्रदेष चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दल बम्पर सेल लेकर आ रहे हैं । जहां आपको किसी भी उत्पाद पर षत प्रतिषत तक की छूट मिल सकती है। यानी टीवी, फ्रीज, लैपटॉप आदि बिल्कुल फ्री। तमिलनाडु में बम्पर सेल के मिले लाभ को देखते हुए। राजनीतिक दल विषेड्ढ उत्साहित हैं। पांच साल से जमे स्टॉक को इस चुनाव में निकाल देना चाहते है। विभिन्न कम्पनियां यानी विभिन्न दल इस चुनाव में लाभ कमाने के लिए किसी स्तर पर जाने को तैयार हैं। इससे लाभ मतदाता को मिलना तय है। लेकिन लाभ किस स्तर तक मिलेगा अभी यह कहना जल्दीबाजी होगी। हो सकता है यह लालीपॉप तक ही रहें। लेकिन आप अभी से आसमान की ओर मुंह बाये खड़े रहें कभी भी कुछ भी टपक सकता है। चाहे जो भी हो सेल के निर्धारण में विभिन्न दल अभी से हीं लग गये हैं। विभिन्न दलों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल सकती है। दूसरे दलों को मात देने के लिए एक से बढ़कर एक ऑफर दिए जाने की संभावना है। छूट देने में दूसरे दल से पीछे हो जाने के भय से राजनीति दलों के बीच कड़ी प्रतिस्र्पधा है। विष्लेड्ढकों के राय में इस बार काफी कड़ा मुकाबला होगा। बाजार विषेड्ढज्ञों ने तमिलनाडु के अनुभवों को देखते हुए दषहरा एवं दीपावली में लोगों को संभलकर खरीदारी करने को कहा है। एक प्रमुख पार्टी के सीनियर नेता से जब हमने जानना चाहा कि आने वाले चुनाव में आपकी पार्टी की क्या मुख्य रणनीति होगी तो उन्होंने कहा कि थोक के भाव में सपने बेचना । उसके लिए विषेड्ढ पैकेजिंग की जाएगी यानी सपनों के महत्व को बताती आर्कड्ढक पंच लाइनें। इसके लिए हम मार्केटिंग के पूरे सिद्वान्त को अपनाया जाएगा। लोगों के लिए सपने का सबसे बड़ा महत्व है। और मेरी पार्टी इसे खुब समझती है। उनका तर्क था कि जनता परिश्रम तो खुब करती है। लेकिन छोटे सपने के चलते पिछुड़ जाती है। इसके विपरीत नेता एवं अधिकारी कम काम करते हैं लेकिन बड़े सपने देखते हैं। यहीं कारण है उनके तो कोठी और बंगले खड़े हो जाते हैं। उनका कहना है उत्तर प्रदेष चुनाव में मेरी पार्टी का स्लोगन होगा बड़ा बनने के लिए बड़े सपने देखो। और उसे पूरा करने के लिए घर द्वार तक बेंचो। जब मैने एक दूसरे दल के बड़े नेता से सपनों के बारे पूछा तो उनका कहना था कि देखिए जिस प्रकार कोई दल आज आरक्षण के जाप को नहीं छोड़ सकता उसी प्रकार राजनीतिक दल सपने बेंचना भी नहीं छोड़ सकते। चुनावी घोड्ढणा पत्र में हम तारे तोड़कर लाने का वादा करत हैं और जनता उसपर विष्वास कर लेती है। यानी जनता भी कहीं न कहीं सपने के महत्व को जानती है। उनका कहना था कि आगामी उत्तर प्रदेष चुनाव में जो पार्टी सपना बेचने में जितना सफल होगी। उसकी सफलता की दर भी उतना हीं अधिक होगी। इसलिए हमलोग आक्रामक मार्केटिंग के लिए प्रफेषनलों की भी मदद ले रहे हैं। जब मैंने तीसरे दल के बड़े नेता से पूछा कि क्या आपभी सपने बेंचने में यकीन रखते हैं । तो उन्होंने मुझसे हीं प्रष्न कर डाला क्यों आपको कोई आपत्ति है क्या। क्या आप चाहते हैं कि जनता को सपने देखने को भी न मिले। निष्कड्र्ढ यह है कि आगामी यूपी चुनाव में सभी पार्टियां लोगों को बड़ा सपने दिखाएगी और अपना बेड़ा पार लगाएगी।