बुधवार, 7 सितंबर 2011

टीचर्स डे पर काॅलेज में फायरींग

वो ट्क ड्ाइवर नहीं लुटेरा था- यह ज्ञान लुट जाने के बाद प्राप्त हुआ न।

क्या यह भगवान राम पसंद करेंगे- रावण तो करेगा न।

ना कहना भी सीखें- और षुरूआत करें पहले अपने कर्तव्यों से ना कह कर।

केंद्र और प्रदेष सरकार धोखेबाज- फिर किस पर करें हम बोलो नाज।

सवाल है इतने सम्मान का हम क्या करेंगे- व्यापार करेंगे।

टीचर्स डे पर काॅलेज में फायरींग- पर तोपों की सलामी बिना सम्मान अधूरा रह
गया न।

नेषनल हाईवे पर दस घंटे तक रेंगती रहीं गाडि़यां- रेंगने का मैराथन हो रहा होगा।

सोमवार, 5 सितंबर 2011

पुत्र का पत्र पिता के नाम

हेलो डैड
हाय
आज मुझे भी महान विभूतियों की तरह से जेल से आपको पत्र लिखने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। आषा है आप मुझपर गौरवान्वित होंगे। पापा ये ऐतिहासक छड़ विरले को मिलता है। जैसा कि पं जवाहर लाल को मिला था। जब उन्होंने अपनी पुत्री को जेल से पत्र लिखा था। लेकिन पापा मैं भूल गया था कि आप पूराने जमाने के व्यक्ति हैं। आपको मेरे जेल जाने से सुख की जगह दुख भी हो सकता है। लेकिन पापा अगर आप अपने दिमाग पर जोर डालें ंतो आपको मालूम होगा जेल जाना षर्म की नहीं गर्व की बात है। क्या भगत सिंह जेल नहीं गये थे। क्या महात्मा गांधी जेल नहीं गये थे। क्या आज के गांधी अन्ना जेल नहीं गये थे। आपने अन्ना के कथन सुना होगा कि जेल तो वीरों का भूषण है। फिर क्यों रो धोकर मुझे आप खरदूड्ढण बनाने पर तुले हुए हैं। क्यों आप अपने बेटे के महत्व को कम करके आंक रहे हैं। क्या आप अपने बेटे से प्यार नहीं करते। आप कहेंगे कि वे सब महान उद्देष्य के लिए जेल गये थे न कि अपने संकीर्ण स्वार्थ के लिए। लेकिन पापा आज मैं हीं नहीं केवल भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद हूं। आज मेरे जैसे अनेक लोग हैं जो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में हैं लेकिन उनके परिवार के लोग आप जैसा पष्चाताप नहीं कर हैं। बल्कि जेल में उन्हें मलपूआ पहंुचा रहे हैं। लेकिन मैं इस दृष्किोण से अभाग हूं। मैं अपने पिता के आदर्ष की बली बेदी पर चढ़ चुका हूं।

मैने आपसे कहा था कि डैड वनडे मेक यू प्राऊड। बट इसके लिए आपको अपना एटीटृयूड बदलना होगा। 21वी सदी के अनुसार अपने को ढालना होगा। बात-बात पर संस्कार एवं कल्चर की दुहाई देनी बंद करनी होगी। थोड़ा अपने आपको को अपडेट करना होगा। मैं नहीं चाहता कि आपके चलते दोस्तों में मेरी नाक कट जाए। आपको मेरे दोस्त दकियानसू विचारों वाला समझें। पापा आखिर आप क्यों नहीं समझते हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। पाड्ढण युग में नहीं। इस युग में कल्चर का कोई महत्व नहीं।
आपको समय के साथ बदलना होगा। धोती कुर्ता की जगह सूटेड-बूटेड होना पड़ेगा। आपके समय में लोग धोती कुर्ता पहनते थे। इसका यह अर्थ नहीं कि आप आज भी पहने। क्योंकि हमारे पूर्वज तो नंगे रहते थे तो क्या हमें भी नंगा रहना चाहिए। डैडी मैं समझता हूं कि इसमें आपकी कोई गलती नहीं बल्कि दादाजी ने आपको गलत संस्कार हीं दिया था। वर्ना आप भी आज मार्डन होते। लेकिन आप कर हीं क्या सकते थे। उस जमाने में आप पिता की इच्छाओं का अनादर भी तो नहीं कर सकते थे । आज की तरह आपके समय में लोगों की स्वतंत्रता थोड़े थी। यहीं कारण है कि आप थोड़ा कुंठित हो गये हैं। इसलिए आपमें आत्म विष्वास थोड़ा कम है। पर घबड़ाने की बात नहीं मैं आपको पर्सनालटी डेवलपमेंट की कोर्स करावा दूंगा। सुना है कि आप अन्ना हजारे के आंदोलन से काफी उत्साहित हैं। लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन से आपको ज्यादा उत्साहित होने की आवष्यकता नहीं । क्योंकि क्या आप समझते हैं लोगों के बदले बिना भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा।
पापा आप तो अपना जीवन जी लिए हो लेकिन अपनी षर्तें थोपकर मेरे जीवन में जहर तो मत घोलो। अब आपको मेरे अनुसार जीना होगा।

पापा आपको मेरे झूठ बोलने पर आपत्ति है। लेकिन मैंने झूठ बोलना किससे सीखा। इसी समाज से सीखा। उन लोगों सेीखा जो आज समाज का नेतृत्व कर रहे हैं। पापा आप क्यों नहीं समझते कि आज महात्मा गांधी नहीं हैं लोग उनको भूला चुके हैं। लोग उनके आदर्षों का इस्तेमाल आज अपने निजी लाभ के लिए कर रहे हैं। कारण कि कहने को तो सभी लोग उनके आदर्षों पर चलते हैं लेकिन तब भी इस देष में भ्रष्टाचार खूब फलता-फूलता है। पापा क्या आज सत्यवादी देष में भूखा नहीं मर रहा है। क्या आप सत्यवादी बनाकर मुझे भूखा मारना चाहते हैं। आखिर आप क्यों नहीं समझते कि आज झूठ बिकता है। सत्य दर-दर की ठोकर खाता है। आषा है आप मेरी बात समझ गए होंगे। देर सबेर आप मेरे बिचार समझ हीं जाते हैं या आपको समझना पड़ता है। मां कहती है कि आप मुझे अपने जान सेे ज्यादा प्यार करते हैं। इसका आपको प्रमाण देना होगा । मैं ऐसे नहीं मानूंगा। इसके लिए आपको अपने आदर्षों को पूत्र मोह के भेंट चढ़ाना होगा। आपको मुझे जमाने के साथ तरक्की करने देना होगा। जैसा कि और लोग तरक्की कर रहे हैं।

अन्त में आपका बेटा- बड़बोलनगुरू।

ब्रिटेन में उपप्रधानमंत्री क्लेग पर फेंका गया पेंट

ब्रिटेन में उपप्रधानमंत्री क्लेग पर फेंका गया पेंट - इसे कहते हैं कि विरोध का उदारवादी तरीका। वर्ना इन दिनों जूतों का मौसम है।


सरकार भ्रष्टाचार नही मिटाना चाहती- बल्कि अन्ना की टीम को पटाना चाहती
है।


गददाफी पर साढ़े सात करोड़ का इनाम- यह तो फिजूलखर्ची है।

आतंकियों को नहीं करने देंगे अपनी जमीन का इस्तेमालःहिना रब्बानी- पिछले कई वड्र्ढों से हम यह प्रतिज्ञा दोहराते रहे हैं। हमारी गंभीरता का आप इससे अंदाजा लगा सकते हैं।

धरती पर 87 लाख प्रजातियां- जिसमें से कुछ दुर्लभ भारत में खजाना उड़ा रही हैं।
भ्रष्टाचार का मुद्दा विधानसभा में गूंजा- कि लोकतंत्र का गला सरकार ने रामलीला मैदान में था घोंटा।

ओबामा के लिए बहुत कठिन डगर पनघट की - पर कहां से भरें वो डालर की मटकी।

क्राइम रिर्पोट देखें डर भगाएं।



मेरा आपको सुझाव है कि अगर आप कमजोर दिल इनसान हैं तो टीवी पर क्राइम रिपोर्ट न देखंे। वरना हार्ट अटैक होने पर जिम्मेदारी मेरी नहीं होगी। थोड़ा मजबूत दिल इनसान को चेस्ट पेन या सर दर्द तक की षिकायत रह सकती है। लेकिन कमजोर दिल इनसान का राम-नाम सत्य होना तय है। दिवाली के पटाखे से षायद आप बच जाएं लेकिन क्राइम रिर्पोट के बम से बचने की संभावना नही ंके बराबर है। हां जो हाॅरर फिल्मों के षौकिन हैं वे जरूर हाॅरर दृष्य का लुत्फ उठाएं। औरत एवं बच्चे ऐसे सीन के प्रति काफी संवेदनषील होते हैं। आइए जानते हैं उनके अनुभव के बारे में कि जब वे पहली बार टीवी पर क्राइम रिर्पोट देखे तो उनको कैसा लगा। आइए जानते हैं मेरी पत्नी के अनुभव। क्राइम रिपोर्ट देखकर रात भर वह जगी रह गई। उसका कहना था कि टीवी वाले भाई साहब जाते-जाते चेतावनी देकर गये थे कि चैन से सोना हो तो जाग जाइए। वह रातभर जागकर ताकती रह गयी कि जरूर कोई बड़ी बात होगी वरना भाई साहब ऐसा थोड़े कहते। वह मुझे समझा रही थी कि आज भी घोड़ा बेंचकर मत सोना जी आज कुछ हो सकता है। पड़ोस की एक बहन जी से जब मैं क्राइम रिर्पोट पर उनकी प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उनका कहना था अजी मत पूछो टीवी वाले भाई जी इतने गुस्से में लग रहे थे मानो वो टीवी से निकलकर आंख खोद देगें। जब तीसरी बहन जी से पूछा तो उनका कहना था कि मेरे बच्चे तो उनके हाव-भाव को हीं देखकर चीखने चिल्लाने लगते हैं। उनसबों कहना था कि अंकल का चेहरा-मोहरा फिल्मों के खलनायक से मेल खाता है। वो मुझे बहुत डरावने लगते हैं।
चैथी बहनजी का क्राइम रिर्पोट के बारे में कहना था कि मुझे तो लगा कि वे मन का भड़ास निकाल रहे थे। हो सकता है कि पत्नी के साथ घर पर हुए संग्राम का यहां गर्जन- तर्जन के साथ जवाब दे रहे हों। सामने हिम्मत जो नहीं हुई होगी।
जब मै लोगों से यह जानना चाहा कि आप ऐसा प्रोग्राम क्यों देखते हैंैं। तो उनमें से अधिकांष का कहना था कि वे डरावनी फिल्मों के षौकिन हैं। कुछ लोगों का कहना था कि लड़ाई झगड़े का कांसेप्ट उनको सीरियलों से पूरा नहीं मिल रहा था। सो उन्हों ऐसी रिर्पोटों को तरजीह दी।
जब मैं कुछ पतियों से पूछा कि टीवी सीरियलों एवं क्राइम रिर्पोटों को देखने के बाद आपके पत्नियों में क्या परिवर्तन आया है। तो उन्होंने कहा अजी मत पूछो वे पहले से ज्यादा संग्राम प्रिय हो गई हैं। वे फिल्मी स्टाइल में हमें डराती धमकाती हैं।
जब मैं रोड़छाप एक्सपर्ट से इस विड्ढय पर उनकी राय जाननी चाही तो वे क्राइम रिर्पोट के कई फायदे गिनाए। जैसे अगर किसी को डरने की बीमारी है तो वह टीवी पर क्राइम रिर्पोट अवष्य देखें क्योंकि एक से एक भयानक दृष्य देखकर मन से डर निकल जाएगा।
जहां तक मेरे बाइट का सवाल है तो मुझे क्राइम रिर्पोट को देखकर लगा कि समाज से संवेदना अभी मरी नहीं है। क्राइम रिर्पोट बांचने वाले भाईजी काफी हमदर्द लग रहे थे। वे लोगों का इतना सावधान करा रहे थे कि अगर आप उसपर पूरा अमल करें तो घर से निकलना बंद कर देंगे। इसके अलावे मुझे लगा कि उनसे दूसरों का दुख दर्द देखा नहीं जाता। तभी दो क्राइम रिर्पोट को  लोगों के सामने ग्लेमराइज करके प्रस्तुत कर रहे थे।

शनिवार, 3 सितंबर 2011

ये है दिल्ली मेरी जान



मैं गीता की षपथ लेकर कहता हूं कि जो कहंूगा सच कहूंगा सच के सिवा कुछ भी नहीं कहूंगा। मैं भी राजनेताओं की तरह सत्यनिष्ठ हूं। और वे सत्य का जितना पालन करते हैं। मैं भी सत्य का उतना हीं पालन करता हूं। इसमें एक प्रतिषत भी संदेह की गुंजाईष नहीं है। जिसको हो सीबीआई जांच करवा ले या कमीषन बैठवा ले। मैं रोकूंगा नहीं। राजा हरिष्चन्द्र के बाद सत्य का पुजारी मैं हीं पैदा हुआ हूं। यकीन न हो तो फेसबुक या टृवीटर पर जाकर मेरी विष्वसनीयता जांच ले। उसके बाद भी अगर संदेह कायम हो तो आंदोलन की राह अपना लें। लोकतंत्र है मै किसी को रोकने वाला कौन होता हूं। मैं सरकार की तरह किसी को अनषन करने से नहीं रोक सकता हूं। यकीन मानीए रामदेवजी की कहानी भी आप पर नहीं दोहरायी जाएगी। इतनी भूमिका काफी है। अब मैं अपने विड्ढय पर आता हूं। हर बार की तरह मैं आपको नयी कहानी सुुनाऊंगा । आज बारी है दिल्ली की।। चूंकी मेरी रोजी-रोटी दिल्ली से हीं चलती है। इसलिए मैं दिल्ली का हीं गुण गाऊंगा। नमक हरामी नहीं करूंगा। यकीन मानीए जिसका मैं खाता हूं उसका गुण गाता हूं। कुछ लोगों को मेरे इस विषेड्ढ गुण पर गहरी आपत्ति है। उनका कहना है कि मैं जहां भी जाता हूं गाने बजाने लगता हूं। आपहीं बताइए आज के युग में कौन किसका गुण गाता है। तो गाना-बजाना मेरी बुराई हुई की विषेड्ढता। कुछ लोगों का कहना है कि मुझे अपना मुंह मिठठू बनने की आदत है। इसपर मेरा कहना है कि आप मेरी प्रषंसा करने का ठेका लें तो मैं अपना गुण नहीं गाऊंगा। अगर ठेका नहीं ले सकते तो कृपया मुझे सलाह न दें। आपसे मैं पूछता हूं कि आज के युग में आप किसी से प्रषंसा की आषा कर सकते हैं। जमाना सेल्फ प्रमोषन का है। अगर आप अपनी प्रषंसा खुद नहीं गाऐंगे तो प्रषंसा सुनने के लिए तरस जाएंगे। लेकिन लोगों को कौन समझाये। लेकिन आप लोगों की बातों में न आएं और गाने बजाने का गुण विकसित करें। आने वाले दिनों में इस गुण के चलते आपको भारी रकम मिलेगी। लोग पैसे देकर आपसे अपने गुणों का गुणगान करायेंगे। जैसा कि पहले के जमाने राजा-महाराजा करवाते थे।
एक बार फिर मैं विड्ढयांतर हो गया। हम बात कर रहे थे दिल्ली के बारे में अपने अनुभव की।
तो अगर आप आप पहली बार दिल्ली आ रहे हैं तो सावधान हो जाइए। क्योंकि खांटी दिल्लीवालों की प्यार भरी बातें आपको गाली जैसी लग सकती है। जबकी हकीकत मैं वे आपसे प्यार कर रहे होते हैं। हालांकि ऐसा अनुभव आपको ज्ञान की नगरी वाराणसी में भी हो सकता है। जहां दोस्त अपने प्यार का इजहार गाली-गल्लौज से करते मिल जाएंगे। हालांकि मेरे जैसे इज्जतदार पुरूड्ढ के साथ ऐसा होने पर आपको बुरा लग सकता है। लेकिन आपके साथ ऐसा होने पर मुझे बुरा नहीं लगेगा। क्योंकि जब मेरे साथ ऐसा हो सकता है तो आप किस खेत की मूली ठहरे। दिल्ली के बारे में मेरा खास अनुभव है कि पार्क हो या मेट्रो सब जगह आप स्वचालित हो जाते हैं। अब मैं दिल्ली मैंट्ो की कथा सुनाता हूं जिस पर हम सबों को गर्व है। दिल्ली मेट्रो के बारे में मै बस इतना हीं कहूंगा कि बस आप लाइन में लग जाइए सब काम अपने आप हो जाएगा। अपने आप आप ट्रेन में पहुंच जाएंगे। अपने आप स्टेषन पर उतर जाएंगे। सबकुछ स्वचालित ढंग से। थोड़ी भी मेहनत नहीं लगेगी। हां आपमें पायलट बनने कि योग्यता होनी चाहिए यानी षत प्रतिषत स्वस्थ्य होना। कमजोर लोगों की गंुजाइष यहां नहीं है। अब बात करते हैं दिल्ली की बसों के बारे में । दिल्ली की बसों के बारे में मेरा कहना है कि दिल्ली की बसें आपको आपकी वीरता साबित करने की मौंका देती है। बसों में इनती भीड़ आपको मिलेगी की आपको आगे बढ़ने के लिए वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो गाना पड़ेगा। जहां तक सीट पाने का सवाल है तो मेरा आपको सुझाव है कि आप विधायक की सीट पाने का प्रयास करें। दिल्ली के बसों में सीट पाना इतना आसान नहीं। वैसे दिल्ली की बसों में यात्रा करके आप तंदरूस्त हीं होंगे। दिल्ली के बारे में मैं एक बात और कहूंगा कि जिसकी अपनी पत्नी के साथ अनबन हो वो आकर दिल्ली में रहना षुरू कर दे। अगर महाभारत की जगह रासलीला न होने लगे तो मूंछ मोड़वा दूंगा। कारण की आप बसों में यात्रा करके इतना थक गये होंगे कि पत्नी गाली क्या अगर ढोल भी बजायेगी आप नहीं जगने वाले हैं। हां जो कार की सवारी करेंगें उनके घर में पति पत्नी में झगड़ा होगा क्योंकि वे लोग स्वस्थ्य रहने के लिए कुछ तो श्रम करेंगे न।
दिल्ली के बारे में मेरा स्पेषल अनुभव यह भी है कि आपको आतंकवादी आक्रमण से ज्यादा डायबीटीज के आक्रमण का भय सताएगा। इसके अलावा आपको चिकनगुनिया का भय सतायेगा मलेरिया का भय सतायेगा। आप सोंच रहें हैं साफ- सुथरा जगह पर मलेरिया और चिकनगुनिया के वायरस क्या करेंगे तो उत्तर है कि वे थोड़ा सभ्य हो गये हैं और सभ्य लोगों को की तरह वो भी बड़ी एवं साफ-सुथरी बस्तियों में रहना पसंद करने लगे हैं। दूसरी बात जहां गांव में समय काटे कटता नहीं वहीं यहां पेट पूजा के लिए भी समय बचता नहीं है। अब बात करते हैं दिल्ली पुलिस की। गांव में जहां पुलिस अपराध के वक्त सोयी रहती है। वहीं दिल्ली में पुलिस जागकर भी खोयी रहती है। अपराध के बारे मेरा मानना है कि अपराधी या तो हिन्दी फिल्मों से अपराध के तरीके सीखते हैं या फिर फिल्मों वाले दिल्ली से अपराध के कांसेप्ट लेते हैं। इसके अलावा दिल्ली में मैने लोगों को पषुओं के दरबे में रहते देखा। प्रकृति की गोद में सड़कों पर सोते देखा।
वैसे दिल्ली के बारे में मेरी रिर्पोट गलत भी हो सकती है। क्योंकि मुझे दृष्टि दोष भी हो सकता है। वैसे भी इन दिनों मुझे पीलिया की षिकायत है। कुछ लोगों की नजर में सावन के अधें वाली कहावत मुझपर ठीक बैठती है। फैसला आपको करना है मैं कोई मनोवैज्ञानिक थोड़े हूं। मैं कोई इतना छोटा आदमी भी नहीं कि अपना आकलन स्वयं करूं। मुझपर रिसर्च तो कोई दूसरा हीं न करेगा ।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

भ्रष्टाचार मतलब हाई ब्लड प्रेषर

भ्रष्टाचार मतलब हाई ब्लड प्रेषर
कुछ लोगों की नजर में देष की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार है जबकि मेरी नजर में भ्रष्टाचार देष की सबसे बड़ी समस्या न होकर यह तो एक लक्षण है असली समस्या है हाई ब्लड़ प्रेषर है। दरअसल दृष्टिदोड्ढ के कारण कुछ लोगों को हर ओर भ्रष्टाचार हीं भ्रष्टाचार दिखाई दे रहा है। तुलसी बाबा कह गये हैं कि जाकि रही भावना जैसी हरी मूरत देखी वह तैसी। अगर ऐसी बात नहीं होती तो सरकार को भी भ्रष्टाचार दिखाई देता केवल अन्ना हजारे एवं अरविन्द केजरीवाल को हीं नहीं दिखाई देता। जो जिस वातावरण में रहता है। उसी प्रकार उसकी भावना होती है। इसका मतलब है कि हमारे सांसद पवित्र एवं सात्विक माहौल में रह रहे है। एवं अन्ना हजारे की टीम इसके विपरीत माहौल में । यह तार्किक निष्कड्र्ढ है किसी को बुरा मानने कि बात नहीं है। दूसरी बात कि मन षांत रहने पर सबकुछ ठीक-ठाक लगता है लेकिन ब्लड़ प्रेषर हाई रहने पर मन बेचैन रहता है और थोड़ी सी समस्या भी भयावह लगती है। अन्ना एण्ड कंपनी की यहीं समस्या है। मेरा तो षुरू से मानना अन्ना एण्ड कम्पनी का ब्लड़ प्रेषर सामान्य नहीं है। वर्ना भ्रष्टाचार जैसी छोटी समस्या पर वो इतना हो हल्ला नहीं करते। हाई ब्लड प्रेषर के चलते हीं देष में व्याप्त थोड़े से भ्रष्टाचार को वे लोग पहाड़ बनाए हुए हैं। दूसरी ओर सरकार का ब्लड प्रेषर नार्मल है। कारण कि अन्ना की टीम के इतना हो हल्ला करने के बावजूद सरकार के कान पर जू तक नहीं रेंगती दिखी। धैर्य इसे कहते हंै। एक दिन नहीं दो दिन नहीं अन्नाजी को 12-13 अनषन करना पड़ा। अपने इसी गुण के ये लोग सरकार चला रहे हैं। एवं अन्नाजी अनषन कर रहे हैं। और हो-हल्ला करने वाले सरकार के बाहर हैं। योग गुरू बाबा रामदेव की टीम का भी ब्लड़ प्रेषर चेक करवाया जाना चाहिए। योग करने से क्या हो जाता है। उनके विरोधियों का तो यहां तक कहना है कि बाबाश्री मंच पर जो उछल कुद करते हैं वह इसी वजह से करते हैं। आष्चर्य देखीए कि योगा सीखाने वाले में अधैर्य आ गया और सीखने वाले में धैर्य। यानी गुरू गुड़ रह गया और चेला चीनी हो गया। योग सीखकर षिष्यों ने गुरू पर रामलीला मैदान में पूरे धैर्यपूवर्वक डंडे बरसाये। और गुरू को तंबू के नीचे छूपना पड़ा। योगा सीखाने से राजनीति थोड़े आ जाती है। दांव-पेंच थोड़े आ जाता है। दूसरी बात कि योगी को माया मोह में पड़ने कि क्या आवष्यकता है। माया में पड़ने पर तो कींचड़ तो लगेंगे हीं न। योगी का संबल धैर्य होता है। इतने छोट से मुद्दे पर रामलीला मैदान में इतना हो हल्ला करके बाबाश्री ने यह साबित कर दिया कि उनमें धैर्य बिल्कुल नहीं है।
मेरा मानना है कि लोकपाल या लोकायुक्त के नियुक्ति से देष से भष्टाचार दूर नहीं होने वाला बल्कि भ्रष्टाचार दूर करने के लिए हाई ब्लड प्रेषर का टीका विकसित किया जाना चाहिए। मेरा ट्ांसपरेंसी इन्टरनेषनल से कहना चाहूंगा कि वे सर्वाधिक भ्रष्ट और सबसे कम भ्रष्ट देषों की सूची जारी करके अपना समय जाया न करें बल्कि ये बताएं कि किस देष में सर्वाधिक हाई ब्लड़ के लोग हैं। क्योंकि हाई ब्लड़ प्रेषर के लोग हीं भ्रष्टाचार पर हो हल्ला मचाते हैं।

चीन हमसे कितना प्यार करता है



पड़ोसी हो तो चीन जैसा नही तो न हो। कारण कि चीन अपने परायेपन का भेद मिटा चुका है। और वसुधैव कुटुम्बकम् हीं उसका आदर्श वाक्य हो गया है। यहीं कारण है कि कभी वह अरूणाचल को अपना भाग कहता है तो कभी किसी और देश के भूभाग को। पर संकीर्ण राष्ट्रवाद के चलते लोग उसके हर कदम का गलत अर्थ निकाल लेते हैं। और उसे आक्रमणकारी आदि क्या-क्या समझ लेते हैं। आखिर विष्व में अनेक राष्ट्र की क्या आवष्यकता है। क्या सभी राष्ट्र या खासकर एषिया के राष्ट्र चीनी छतरी के नीचे नहीं आ सकते। और वह भी तब जब वह गा रहा हो मेरी छतरी के नीचे आ जा। क्या अनेक राष्ट्रों का सिद्वान्त विष्व बंधुत्व में बाधक नहीं है।


ऐसा नहीं कि चीन की नेक नीयति पर हर कोई षक करता हो। उसकी भावनाओं को समझने वाले मुझ जैसा लोग भी इस धरती पर हैंैं। और चीन की भावनाओं को समझने वाले लोगों के बल पर हीं देष में हिन्द-चीन भाई भाई का स्पिरिट समय-समय ऊफान मारता है। लेकिन इस स्पिरिट को कुछ भाईजी लोग समाप्त करने पर तुले हुए हैं। लेकिन इसके बावजूद यह भाव मौजूद है। चीन पहले भी हिन्द-चीन भाई-भाई के विष्वास पर खरे उतरा था और भविष्य में भी खरा उतरेगा ऐसा मेरा विष्वास है। इसमें एक प्रतिषित भी संषय करने की गुंजाइष नहीं है।


लेकिन कुछ भाईजी लोग मेरे विष्वास का माखौल उड़ाने में भी पिछे नहीं रहते हैं। और मुझे कल्पना लोक में जीने वाले प्राणी आदि उपमाओं से विभूषित करते हैं। लेकिन उनका यह व्यवहार मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। कारण कि वो अपना क्या जो इस प्रकार का अपनापन न दिखाये। जब लोग मेरे विष्वास पर हसते हैं तो मुझे उनपर दया आती है कारण कि वे मेरे जैसा ज्ञानी थोड़े हैं।


भारत ने विष्वास के महत्व को षुरू से समझ लिया था। उसने यह जान लिया था विष्वास के द्वारा असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। सफलता के लिए आत्मविष्वास बहुत जरूरी है। विष्वास के द्वारा हृदय परिवर्तित किया जा सकता है। दूसरी तरफ हर किसी पर अविष्वास करना भी एक बिमारी है। खासकर चीन जैसे पड़ोसी पर। सबपर अविष्वास करना व्यवहारिकता के दृष्टिकोण से भी उचित नहीं कहा जा सकता। क्योंकि फिर लोक व्यवहार कैसे चलेगा।


अगर आपको लगता है कि चीन अरूणाचल में घुसर रहा है तो यह आपकी भूल है। मान लीजिए घुसर हीं रहा है तो अगर अपना अपनों पर हक नहीं दिखायेगा तो भला कौन दिखायेगा। दूसरी बात चीनी षासक अरूणाचल को चीन का हिस्सा इसलिए साबित करना चाहते हैं क्योंकि उनको ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी है यानी वह संपूर्ण पृथ्वी को हीं अपना परिवार मानने लगे हंै। और देषों को अभी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई है। क्या भारत चीनी सैनिकों के अरूणाचल में दिखाये गये सद्भाव का विरोधकर संकीर्णता का परिचय नहीं दे रहा है। चीन इस तरह का सद्भाव कई देषों के साथ दिखाता है। या दिखाने की कोषिष करता है। लेकिन आष्चर्य है कि सभी देष उसके सद्भाव को बैर भाव की तरह लेते हैं। जहांतक ब्रम्हपुत्र नदी पर बांध बनाने का सवाल है तो सरकार को चीन के इस कदम का स्वागत करना चाहिए। क्योंकि सरकार क्या चाहती है कि लोग ब्रम्हपुत्र नदी की धारा में बह जाएं। आखिर जो काम सरकार को करना चाहिए। उसे चीन की सरकार ने मुफ्त कर दिया तो इसमें रंज होने की क्या जरूरत है। आखिर करोड़ो की फसल ब्रम्हपुत्र नदी की बाढ़ में बरबाद हो जाती है। चीन ने भारत के हित के लिए विष पी लिया है। और लोग हैं कि समझते हीं नहीं।


पुत्र पिता की संपत्ति को अपनापन के चलते हीं न अपना समझता है। चीन अगर भारत की संपत्ति को अपना समझ रहा है तो निष्चत तौर पर भारत के प्रति उसका अपनापन ज्यादा है। वरना ऐसे हीं किसी की संपत्ति कोई अपना थोड़े समझने लगता है। वह न्यूयार्क और मास्को को अपना थोड़े कहता है। आष्यकता है मेरे जैसे समझदार लोगों की जो चीन के इस भाव को समझ सके।


मेरा मानना है कि भारत को अपनी सुरक्षा जिम्मेदारी चीन को सौंप देना चाहिये। क्योंकि चीन जैसा आपको हितैषी पड़ोसी नहीं मिलेगा। अगर चीन हथियारों का जखीरा तैयार कर रहा है तो वह भारत की सुरक्षा जरूरतों को घ्यान में रखकर हीं ऐसा कर रहा है। वरना वह इतने बड़े पैमाने पर हथियार बनाकर क्या करेगा। आखिर पड़ोसी-पड़ोसी के काम नहीं आयेगा तो कौन आयेगा। पहले अमेरिका अन्य देषों के सुरक्षा जरूरतों का ध्यान रखता था और पूरे विष्व के लिए हथियार बनाता था। अब चीन बनाना चाह रहा है।


वैसे तो मुझे चीन की नेक नीयति में कोई संदेह नहीं है। लेकिन जिसको संदेह है और चीनी आक्रमण का भय सता रहा हैै। वह हिन्द-चीन भाई-भाई मंत्र का जाप कर सकते है। कहते हैं मंत्रों में बड़ी ताकत है। भाव के साथ मंत्रों के जाप करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। फिर चीन की क्या विसात है।
मेरा तो कहना है हिन्द-चीन भाई-भाई स्तोत्र का पाठ देषवासियों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिये। इसका कारण यह है कि मंत्र विज्ञान के अनुसार मंत्रों का सामुहिक पाठ से चमत्कारिक प्रभाव उत्पन्न होता है। अगर हिन्द-चीन भाई-भाई का सामुहिक पाठ किया जाय तो उसकी ध्वनियां चीन तक पहुंच जायेगी और चीनी के सत्ताधीषों के मति को षांत कर देगी।